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गुरुवार, 30 अगस्त 2018

अन्तरिक्ष परी - कल्पना चावला

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चित्र--- अपनी चिरपरिचित  गर्वित मुस्कान के साथ कल्पना चावला --
परिचय भारत  की अत्यंत साहसी और कर्मठ बेटियों  का जिक्र बिना  कल्पना चावला के कभी पूरा  नही  होता |  उन्हें  भारतीय मूल की पहली   महिला  अन्तरिक्ष -यात्री होने का  गौरव प्राप्त है|   कल्पना  चावला   भारतीय  नारी का वो चेहरा  है जिसने  अपनी विलक्षणता और  निरंतर लगन से अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर रहकर आम लड़की  को  नयी पहचान दी है | वे आम भारतीय परिवार में उस समय जन्मी जब  समाज में नारी की शिक्षा के प्रति  अधिक जागरूक नजरिया   नहीं था | आम परिवारों में उस समय बेटियों के सपनों का  कोई  मूल्य नहीं था |सपना भी इतना अद्भुत अर्थात  एरोनाटिक इंजिनियर    बनने का  , जो   उस समय  सिर्फ पुरुषों के वर्चस्व का क्षेत्र था   |  लेकिन कल्पना भाग्यशाली रही कि वे खुद तो बहुत ही लगन शील थी ही -उन्हें ईश्वर ने ऐसे माता  -पिता  भी  दिए,  जिन्होंने बेटी के सपनों को साकार करने में कोई  कसर नहीं छोडी  |    उन्होंने उसे अपने सपने साकार करने का पर्याप्त अवसर   और सहयोग दिया   |नारी के शनै - शनै  हो रहे उत्थानकाल में  वे  एक प्रेरणा पुंज की भांति  अवतरित हुई और देखते ही देखते  अपनी अद्भुत प्रतिभा के चलते -अपने नगर , राज्य  , और देश को छोड़कर कर  विश्व की समस्त   नारी जाति के लिए  एक आदर्श महिला बन गयी |उन्होंने अपनी अथक मेहनत से अपने सपनों की सबसे ऊँची उड़ान भरी | | कल्पना अपनी  जुझारू प्रवृति  के लिए तो  प्रसिद्ध है ,  साथ में अपनी सरलता और सादगी केलिए भी जानी जाती है |वे  एक गम्भीर श्रोता  और संकोची स्वभाव की मितभाषी   लडकी थी | उन्हें वैभवशाली जीवन से मोह नहीं था | 'सादा जीवन उच्च विचार 'की  परम्परा  का निर्वहन करते हुए उनकी दृष्टि   हमेशा   अपने लक्ष्य पर रही |उन्हें  ना  भौतिकता से  मोह था ,   ना किसी बनावटी जीवनशैली से |उनकी प्रतिभा के साथ - साथ उनकी सादगी   भी प्रेरक है | उन्होंने एक साधारण बालिका से  ले कर अन्तरिक्ष यात्री  का शानदार जीवन जिया और अपने जीवन को  हर स्वप्नदर्शी बालिका के लिए प्रेरणा  का प्रतीक बनाया |
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चित्र -- पति और परिवार के साथ कल्पना 
जीवन परिचय -  हरियाणा राज्य के छोटे से शहर  करनाल में 17 मार्च 1961 को  एक मध्यमवर्गीय परिवार में कल्पना का जन्म हुआ |  माता - पिता की चार संतानों में वे सबसे छोटी थी | उनके पिता  श्री बनारसी  दास  चावला और  माँ का नाम संजयोती  था |    कल्पना को बचपन में मोंटी नाम से पुकारा जाता था ,पर जब उन्हें  स्कूल में दाखिला ले दिलवाने के लिए ले जाया गया तो स्कूल की अध्यापिका ने उन्हें  उनके प्यार के नाम से अलग  तीन  सार्थक नाम  सुझाये,  जिनमे से उन्होंने 'कल्पना' नाम को चुना , इस तरह से --नन्ही मोंटू ' को   अपना ही चुना  'कल्पना ' नाम मिला जो उनके लिए  अत्यंत  शुभ और सार्थक रहा |अपनी उम्र के दूसरे  बच्चो से काफी भिन्न  कल्पना को  सितारों की दुनिया से  विशेष अनुराग था | अपने बचपन में वे अक्सर  छत पर बैठ विशाल आसमान को  निहारा करती  और उनकी ही कल्पना में गुम रहती | शायद उनका  सितारों की दुनिया से ये लगाव  ही -उनके   भविष्य के  जीवन के लिए कहीं ना कहीं  भूमिका   तैयार कर रहा था ,  साथ में  एक  दैवीय  संकेत भी था  कि उन्हें अंततः  किसी दिन इसी विराट अन्तरिक्ष का हिस्सा हो जाना था कल्पना चावला को शुरू से ही जे आर डी टाटा के जीवन ने बहुत ने बहुत प्रभावित किया और वे उनके बहुत बड़े  प्रेरणा स्त्रोत रहे |शुद इस लिए भी कि वे एक सफल उद्योगपति तो थे ही , साथ में एक सुदक्ष पायलट  भी थे और अपने अदम्यसाहस और जुझारूपन के लिए जाने जाते थे | सभाग्य से करनाल एक छोटा शहर होते हुए भी उन गिने  चुने  शहरों में से एक है जिसमे एविएशन क्लब था | कल्पना का मन  उस क्लब के छोटे -छोटे विमानों में यात्रा करने  को मचलता था | उनके पिताजी एक दिन उन्हें उनके भाई के साथ  छोटे से  विमान से  हवाई यात्रा करवाई |ये उनकी हवाई यात्रा का पहला अनुभव था |  शायद इसी रोमांचक अनुभव   ने कल्पना  को इस क्षेत्र  में आने के लिए निरंतर प्रेरित किया होगा| 
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चित्र --- कल्पना चावला  एक मनमोहक मुद्रा में 

शिक्षा --बचपन से  अत्यंत मेधावी छात्रा रही कल्पना  ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा करनाल के ही '' टैगोर बाल निकेतन  स्कूल  '' से पूरी की, जो आज भी अपने गौरवशाली इतिहास पर गर्वित कल्पना चावला के स्कूल के नाम से जाना जाता है  

 |उन्होंने पढाई के लिए कोई समझौता नहीं किया  |स्कूल के बाद उन्होंने  1982 में  चण्डीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से '' एरोनाटिकल इंजीनियरिंग '' की  डिग्री प्राप्त  की |डिग्री धारण  कर घरवालों के विरोध के बावजूद उन्होंने अमेरिका जाकर टेक्सास विश्विद्यालय से   एयरोस्पेस इंजिनीयरिंग  में  1984 में स्नातकोत्तर की डिग्री  ली |इसके बाद भी कोलराडो विश्वविद्यालय से एयरोस्पेस इंजिनीयरिंग  में  पी एचडी  हासिल  की | उन्होंने हवाई जहाज , ग्लाइडर, और  व्यावसायिकविमानचालक के लिए  लाइसेंस भी प्राप्त किये जो उन दिनों एक लडकी के लिए बहुत बड़ी  उपलब्धि थे | इस प्रकार वे निरंतर सफलता की सीढी चढ़ते हुए कल्पना उपलब्धियों के  नित नये आकाश  छू रही थी | 
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चित्र -- अंतिम यात्रा  के सहयात्री 
कार्य उपलब्धियां -- कल्पना ने पढाई के बाद 1988 में नासा के लिए काम करना शुरू कर दिया वे वहां एम्स  अनुसन्धान  केंद्र के लिए ''ओवेर्सेट मेथड्स इंक''    के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करने लगी  | 1996 में उन्हें अन्तरिक्ष यात्री कोर में शामिल कर लिया गया और वे अंततः वे एक अन्तरिक्ष यात्री के रूप में चुनी गयी | यहीं से कड़े  प्रशिक्षण के बाद उन्होंने  19  नवम्बर  1997 को छह सदस्यीय दल के साथ  अन्तरिक्ष  शटल कोलंबिया की फ्लाइट संख्या ''  एसटीएस-87 ''  से  अपनी पहली अन्तरिक्ष  उड़ान भरी |इस यात्रा के दौरान  कल्पना ने अपने साथी अन्तरिक्ष विज्ञानियों के साथ अन्तरिक्ष में 372 घंटे बिताये और अन्तरिक्ष  से पृथ्वी के  252चक्कर लगाये |इस दौरान उन्होंने अतरिक्ष की 1.04  मील की यात्रा की |ये दल 5 दिसम्बर 1997 को अपने   इस मिशन से वापिस आया | इस महत्वाकांक्षी उड़ान के बाद उन्होंने नासा  अन्तरिक्ष यात्री केंद्र में  विभिन्न तकनीकी पदों पर  कार्य  किया जिसके लिए उन्हें बहुत ही सराहना मिली और  उनके साथियों ने उन्हें विशेष पुरस्कार देकर सम्मानित किया |
कल्पना चावला भाग्यशाली रही कि उन्हें दूसरी बार फिर से अन्तरिक्ष यात्रा के महत्वकांक्षी मिशन के लिए चुना गया , जिसके जरिये  पृथ्वी  और अन्तरिक्ष विज्ञान , उन्नत विकास व  अन्तरिक्ष यात्री  स्वास्थ्य  व सुरक्षा का अध्ययन होना था | 
इस  उड़ान में कर्मचारी दल में उनके साथ   कमांडर रिक डी . हुसबंद, पायलट विलियम   स . मैकूल ,  कमांडर माइकल  पी  एंडरसन , इलान रामो  , डेविड म . ब्राउन और  लौरेल बी . क्लार्क नाम के सहयात्री भी थे | 16जनवरी 2003 को कोलम्बिया शटल के जरिये ही  मिशन '' एस टी एस 107'' का आरम्भ हुआ | इस यात्रा में कल्पना के जिम्मे  अहम जिम्मेवारी थी | लघु गुरुत्व पर  इन यात्रियों ने  80 प्रयोग किये जिसकी जानकारी ये नासा को भेजते रहे | पर इस यात्रा के साथ ही कोलम्बिया विमान और इन यात्रियों की यह आखिरी यात्रा साबित हुई | 1 फरवरी 2003 को पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते समय ये अन्तरिक्ष यान दुर्घटना ग्रस्त हो गया और उसमे सवार इन सभी सातों होनहार वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की मौत हो गयी | उस समय इस शटल  की  धरती से दूरी    मात्र 63  किलोमीटर थी |     कहते हैं कल्पना चावला का कथन था , '' कि मैं अन्तरिक्ष के लिए ही बनी हूँ मेरा प्रत्येक पल अन्तरिक्ष के लिए है और इसमें ही विलीन हो जाऊंगी'' | उनका ये कथन उनकी  उनकी  दुखद मौत के बात एक कटु सत्य में बदल गया |  कल्पना चावला के साथ ये  अन्तरिक्ष यात्री मानवता के लिए अहम अनुसन्धान का योगदान देकर अनंत में विलीन हो गये | 
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पुरस्कार और सम्मान --- कल्पना चावला को मरणोपरांत अमेरिका  में अनेक पुरस्कार से सम्मानित किया गया जिनमे 

   कांग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान, नासा अन्तरिक्ष उडान पदक, नासा विशिष्ट सेवा पदक इत्यादि शामिल हैं | इसके अलावा उनके नाम पर अमेरिका और भारत दोनों में अनेक  महत्वपूर्ण  योजनायें  चलाई  गयी हैं जिनका लाभ अनेक  छात्र - छात्राएं ले रहे हैं  | अमेरिका की कुछ सम्मान  योजनायें    इस तरह हैं -   भारतीय छात्र संघ द्वारा टेक्सास विश्वविध्यालय में मेधावी छात्रों के लिए कल्पना चावला स्मृति छात्रवृति पुरस्कार  के साथ इसी  विश्वविध्यालय में उनके नाम से एक हाल  का नामकरण किया गया   | यहाँ     से उन्होंने स्नाकोत्तर डिग्री हासिल की थी  |न्यूयार्क शहर  में जेक्सन हाइटस  क्वींस स्ट्रीट    74 का  , 74 कल्पना चावला  के नाम से पुनः नामकरण किया गया है | फ्लोरिडा प्रद्योगिकी संस्थान  के छात्र परिसर में  कोलम्बिया यान के  दिवंगत  सातों यात्रियों के नाम पर एक -एक विद्यार्थी परिसर  का नाम रखा गया है | नासा ने एक  सुपर कंप्यूटर को कल्पना नाम देकर  कल्पना चावला को सम्मानित किया है | 
इसके अलावा भारत ने भी अपनी बेटी को नहीं भुलाया है और उनके सम्मान को अक्षुण रखने के लिए अनेक योजनायें जारी की | केंद्र के साथ - साथ  हर राज्य  सरकार  उनके नाम पर  पुरस्कार और  अन्य महत्वपूर्ण प्रोत्साहन योजनायें चलाई  हैं | इनमे से कुछ इस तरह हैं | पंजाब विश्वविद्यालय में लडकियों के एक छात्रावास का नाम कल्पना  चावला के नाम पर है साथ में उनके नाम पर होनहार छात्र - छात्राओं के लिए कईनकद पुरस्कार  शुरू किये है |कर्नाटक सरकार ने युवा महिला  वैज्ञानिक के लिए कई नकद पुरस्कार  स्थापित किया गया है | कुरुक्षेत्र ज्योतिसर में स्थापित तारा मंडल का नाम  कल्पना चावला के नाम पर  रखा  गया है ,तो  इसरो के मौसम विज्ञान सम्बन्धी उपग्रहों का नाम भी कल्पना के नाम पर रखा गया है |माध्यमिक बोर्ड  ने भी होनहार छात्रों  के लिए उनकी स्मृति - स्वरूप छात्रवृति  की शुरुआत की गई| इन योग्नाओं से लाभ लेने वाले छात्र  अवश्य ही उनके जीवन  से प्रेरणा ले कुछ अच्छा  करने के लिए होंगे |
 | यूँ उन्हें  प्रतिभावान पलायनवादी  भी कहा गया   और उनपर  आरोप लगता रहा कि वे भारत की नहीं अपितु अमेरिकी  नागरिक की हैसियत से अन्तरिक्ष यात्री बनी |पर भारत में आजतक मात्र एक पुरुष राकेश शर्मा को ही अन्तरिक्ष में जाने का  सौभाग्य  मिला है |यहाँ रहकर शायद ही वे वो मुकाम हासिल कर पाती जो उन्होंने अमेरिका में जाकर प्राप्त किया | अमेरिका जैसे सुविधा संपन्न देश सदैव से ही  प्रतिभाओं  को हाथोहाथ लेते रहे हैं चाहे वे किसी भी देश से क्यों ना हों | और भारत में भ्रष्टाचार और भाई  भतीजावाद  की नीतियाँ किसी से छिपी नहीं है | ऐसे में एक महत्वकांक्षी लडकी का बेहतर भविष्य के लिए विदेश जाना कोई अनुचित नहीं दिखायी  पड़ता  |

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चित्र -- पति जे पी हैरिसन के साथ कल्पना--
 निजी जीवन और भारत यात्रा --- कल्पना  चावला को एम् टेक की पढाई के दौरान फ़्रांस  के नागरिक जों पियरे हैरिसन  से प्रेम हो गया जिससे बाद  में उन्होंने शादी कर ली  |जों अमेरिका में ही प्रशिक्षक थे |वे कल्पना  की सादगी भरे  संस्कारों  से इतना प्रभावित हुए  कि उन्होंनेसमस्त भारतीय  संस्कारों सेइतना प्रभावित हुए कि उहोने  समस्त भारतीय संस्कारों के साथ शाकाहार भी हमेशा के लिए अपना लिया | 1991 में  दोनों  को अमेरिकी नागरिकता मिल गयी | |वे अंतिम बार 1991 -1992 की नव वर्ष की छुट्टियों  में भारत अपने पति और परिवार के साथ आई   थी |उनकी मौत के बाद  करनाल व अन्य  जगहों पर , उनकी स्मृति में  आयोजित किये गये श्रद्धान्जलि    समारोहों  में उनके पिता, पति और अन्य   परिवारजन  विशेष रूप से शामिल हुए थे |


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 चित्र ००० करनाल में कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज और  अस्पताल  
 कल्पना और करनाल ------ यूँ  तो करनाल की अपनी एतहासिक और पौराणिक पहचान है |इसे महाभारत के प्रसिद्ध पात्र कर्ण की नगरी के नाम से जाना है और आधुनिक सन्दर्भ में कहें तो एशिया का सबसे बड़ा   डेरी अनुसंधान जिसे NDRI के नाम से जाना है , भी यहीं स्थित है ,पर     कल्पना चावला ने इस शहर को वैश्विक  स्तर पर अलग ही पहचान दिलवाई है | अब इसे संसार भर में  बस  कल्पना चावला के जन्म स्थान के रूप में  ही ज्यादा जाना जाता है |उनके पिताजी की करनाल में कपड़े की दूकान थी | बाद में  उनका परिवार यूँ तो करनाल छोड़कर दिल्ली बस गया था , पर कल्पना ने भारत के साथ- साथ अपनी जन्म भूमि करनाल को कभी नहीं बिसराया | विद्यार्थियों के वैज्ञानिक  उत्थान के लिए शुरू की गयी नासा यात्रा में पूरे हरियाणा से दस  विद्यार्थी  प्रतिवर्ष नासा जाते हैं ,जिनमे से दो छात्र कल्पना चावला के स्कूल ' टैगोर बाल निकेतन 'से होते हैं | जो बच्चे कल्पना के जीवन काल में नासा गये उन्हें वे विशेष तौर पर अपने घर आमंत्रित कर करती और  अपने हाथों से खाना बनाकर खिलाती | आज भी उनके स्कूल में उनकी  स्मृतियों को नमन करते हुए  उनकी पुण्यतिथि और जन्म - दिन  पर कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं | बच्चे उनके स्कूल में पढ़ खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं |  टैगोर बाल निकेतन की प्रिंसिपल माननीया पुष्पा रहेजा इस बात पर गर्व अनुभव करती थी, कि उनके स्कूल की एक ही छात्रा ने उनके साधारण स्कूल को असाधारण बना दिया | उनके  सहपाठी  उन्हें  बहुत ही भावपूर्ण ढंग से याद करते हैं |हरियाणा सरकार ने  भी अपनी   प्रतिभाशाली और लाडली  बेटी के सम्मान में करनाल के  सरकारी   अस्पताल और मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर  - क्प्ल्पना चावला अस्पताल करदिया है  जो  कि चण्डीगढ़ के  स्नातकोत्तर संस्थान अर्थात PGI के  समकक्ष माना  गया है | इस भव्य अस्पताल में  मरीजों के उपचार के लिए हर आधुनिक सुविधा मुफ्त में मौजूद है और भविष्य के चिकित्सक भी यहाँ प्रशिक्षित होने शुरू हो गये हैं |

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चित्र -- अबोध बचपन में कल्पना 

मौत भी रही विवादों में -- कल्पना चावला की मौत भी विवादों से  दूर नहीं रही | कोलम्बिया यान की दुर्घटना के बाद नासा के'' मिशन कोलम्बिया 'के  प्रोग्राम मैनेजर  वें हेल  की मीडिया रिपोर्ट के  अनुसार कल्पना और उनके सहयात्रियों की मौत उसी दिन तय हो गयी थी जिस दिन उन्होंने अन्तरिक्ष के लिए संयुक्त उड़ान भरी थी | नासा को पता चल गया था कि यान में मात्र 15दिन के लिए ही ऑक्सीजन है | पर अपनी मौत से बेखबर ये अभागे वैज्ञानिक अपने अनुसन्धान की पल पल रिपोर्ट नासा को भेजते रहे | नासा ने अपनी विवशता जताई , कि उन्हें सचाई बताकर भी कोई लाभ होने वाला नहीं था | उन्होंने स्वीकारा ये एक तरह से सातों अन्तरिक्ष यात्रियों की मौत की साजिश थी | नासा ने इस विवाद पर कभी कोई सफाई नहीं दी है पर  इस  विवाद  से अनेक प्रश्न उठ खड़े होते हैं |
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चित्र -- एक प्रेरक मुस्कान 

एक प्रेरक जीवन -- तमाम विवादों के बावजूद कल्पना चावला का जीवन समस्त भारतीय नारियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत है | सितारों की दुनिया  में उनकी संकल्प -गाथा अमर और अटल है | उनका दृढ निश्चय और निरंतर कर्म - पथ पर अग्रसर  हो , सफलता प्राप्त करने की कहानी अपने आपमें  समाज और नारी जगत में एक नयी आशा का संचार करती है | निराशा में उनका जीवन हमेशा एक प्रेरणा पुंज बनकर जगमगाता रहेगा |

समस्त चित्र-- गूगल से साभार 

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धन्यवाद शब्द नगरी -------

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (अन्तरिक्ष परी - कल्पना चावला ) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
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रविवार, 12 अगस्त 2018

सावन की सुहानी यादें -- लेख -




सावन के महीने का हम महिलाओं के लिए विशेष महत्व होता है | फागुन के बाद ये  दूसरा महीना है जिसमे हर शादीशुदा  नारी को मायका याद ना आये .ये हो नहीं सकता | मायके से बेटियों का जुड़ाव   सनातन है | मायके के आंगन  की यादें कभी मन से ओझल नहीं होती |  भारत में  प्रायः  हर जगह  सावन के महीने में  मायके  की  ओर से बेटियों को   विशेष महत्व दिया जाता है |माता- पिता चाहे कैसी भी आर्थिक स्थिति से  गुजर रहे हों पर अपनी बेटियों के लिए कुछ ना कुछ उपहार  स्नेह स्वरूप भेजना चाहते हैं | अक्सर हर जगह  मायके में इस महीने में बेटियों  को  मायके बुलवाने का भी रिवाज है |    विवाह के बाद पहला सावन    भी लडकियों के लिए बहुत ही उमंग भरा  होता है जिसमे ससुराल पक्ष की ओर सिन्धारे के  रूप  में स्नेह  का उपहार भेजा जाता है | मुझे भी अपने गाँव का सावन  के   अनेक  रोमांचक पल भुलाये नहीं भूलते | मेरे लिए ये इसलिए भी बहुत खास रहे  .क्योकि मेरी  शादी  के बाद सावन के महीने में  मैं कभी मेरे गाँव  नहीं जा पाई| हालाँकि दो बार रक्षाबन्धन  पर जरुर गयी हूँ पर  इस दिन सावन  का अंतिम दिन होता है अतः मुझे   सावन के झूलों का वो नजारा कभी नजर नहीं आया जो बचपन में हुआ करता था |  सावन के साथ मुझे हमारी बैठक का  नीम  का पेड़ याद आ जाता है जहाँ  हमारे  अबोध से बचपन में बाबाजी यानी  मेरे दादाजी अपने खेतों के सन से  बटी गयी खूब मजबूत  रस्सी   नीम की  मजबूत सी डाल पर सावन के पहले ही दिन   डलवा देते थे जिसपर हम बच्चे -जिनमे आसपास की सभी लडकियाँ  बड़ी ही  उमंग  से झूलने आ जाती थी |  बच्चों विशेषकर  लड़कियों का अमूमन बैठक में कम ही  आना होता था इसलिए सावन के झूल के बहाने दिन भर बैठक में मंडराने का मौक़ा  हमारे लिए बड़ा अनमोल था | सबसे ज्यादा    हर्ष का विषय  था हमारे तेज -तर्रार दादा जी का  इस महीने में बदला व्यवहार | वे बिना किसी  डांट- डपट के सभी लड़कियों को बहुत ही स्नेह से झूलने  और सावन के गीत गाने के लिए   प्रोत्साहित करते  |  वे हमें दो -दो  के रूप में झूले पर झुलना सीखाते और खुद पास में  पडी  खाटपर बैठ  बड़े स्नेह और आनन्द से हुक्का  गुडगुडाते    हुए हम लड़कियों को निहारते | उनका कडक स्वभाव पुरे महीने के लिए अत्यंत मृदुल और स्नेहभरा हो जाता | |बहुत बचपन में  हमें  सावन के गीत नहीं आते थे तो वे हमे दो गीत सिखाते  जो  पूरे तो अब याद नहीं पर उनके कुछ  बोल  आज भी बरबस याद आ जाते हैं --
 काले पानियों में लम्बी  खजूर -- बिजली चमचम करे -
 मेरे दादा का घर बड़ी दूर बिजली चमचम करे !!!!!!!!!
 उस समय इस गीत को सुन- सीख कर  लबालब भरे   काले पानी  और  लंबे  खजूर  के पेड़ का चित्र  मानस पर सदा के लिए  ठहर गया | दूसरा गीत था --
 नीम्ब की निम्बोली पके सावन कद कद आवेगा -
जीवे री मेरी माँ का जाया गाडी भर भर ल्यावेगा !!!!!!!
 जब थोड़े बड़े हुए तो  बैठक  की बजाय घर के बरामदे की छत में पडी हुई बेलनी में बेडी डलवाई जाती और लडकियां पूरे सावन खूब झूला झूलती  |इस बेलनी को  नया मकान बनवाते समय खास तौर पर मेरे पिताजी ने हम बच्चों के झूल डलवाने के लिए छत में  लटकवाया  था  |उन दिनों प्राय हर घर में झूल डाले जाते |  जिनके यहाँ शादी के बाद किसी बहु या बेटी का पहला सावन होता उनके यहाँ की रौनक अलग ही दिखाई देती | उनके यहाँ से दोपहर में सामूहिक  झूलने का न्योता आता और सभी महिलाएं काम-धाम निपटाकर झूले  पर झूलने को लालायित रहती |मुझे याद है जब मेरे बड़े भाई  की शादी हुई तो मेरी माँ ने  सामूहिक रूप से  झूल पर झूलने के लिए    पडोस  और परिवार की महिलाओं  को सात बार न्योता भिजवाया |खूब झूला झुला जाता और हंसी मजाक होता  | झूलने के बाद नाचने गाने का लम्बा दौर चलता | बड़े ही मार्मिक  और रसीले गीत गाये जाते  | 
 पुरुषों के रूप में प्राय छोटे लडके ही उपस्थित हो सकते थे  बड़े नहीं |जिस दिन तीज होती  सभी  महिलाएं नये कपड़े पहनती | उस समय मेहंदी  रचे हाथों में नयी  चूड़ियाँ बहुत ही रोमांचित करती थी | रसोई में  खूब चटपटे पकवानों  बना बड़े ही उल्लास से तीज मनाई जाती | घेवर , फिरनी , पेडे के रूप में खूब मिठाई खायी खिलाई जाती |

हरियाणा में सावन में    लोकदेवता जौहर वीर गोगा पीर जी के गीत गाये जाते हैं और यह महीना उनकी पूजा का भी महीना है | सावन के गीतों में उनकी लोक गाथाएं गाई जाती हैं |
आज स्वप्न  जैसी  वो हरियाले सावन की यादें  मन को कभी उदास तो कभी उल्लास से भर देती हैं |
 कई बार बैठे बिठाये कुछ  भूले  गीतों  जैसे -
 सात जणी का झुलना मेरी माँ -
या फिर
आया तीजां का त्योहार
आज मेरा बीरा आवैगा--
  के अस्फुट बोल अनायास याद आ जाते हैं और मन को  कहीं ना कहीं उस  भूली -बिसरी हरियाली से जोड़ देते हैं |-
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------पाठकों के लिए विशेष  --- 

अनुराग  भरा एक सुंदर हरियाणवी गीत --मेरा अनुरोध जरुर सुने --
भावार्थ उनके लिए जिन्हें हरियाणवी नहीं आती --
  अलिये  गलियों   में मनरा [मनिहार ]फिरता है -
री ननदी  मनरे को ले  आओ  ना बुलाय -
 चूडा तो हाथी दांत का 
री ननदी  चूड़े  ने ले ली मेरी जान -
  चूडा  हाथी दांत का!!! 
हरी चूड़ी तो ननदी ना पहरू-
 हरे मेरे राजा जी के खेत बलम जी के खेत -
  चूडा तो हाथी दांत का 
री ननदी  चूड़े ने ले ली मेरी जान -
  चूडा  हाथी दांत का!!! 
 धौली [सफेद ] चूड़ी तो ननदी ना पहरू-
 धौले मेरे राजा जी के दांत बलम जी के  दांत -
  चूडा तो हाथी दांत का 
री ननदी चुडे ने ले ली मेरी जान -
  चूडा  तो हाथी   दांत का!!! 
 काली चूड़ी तो ननदी ना पहरू-
अरी ननदी काले   मेरे राजा जी के  केश बलम जी के  केश  -
   चूडा तो हाथी दांत का 
री ननदी चूड़े  ने ले ली मेरी जान -
  चूडा  हाथी दांत का!!! 
पीली तो चूड़ी री ननदी मैं पहरूं-
री ननदी पीली मेरे राजा जी की पाग [पगड़ी ]बलम जी की पाग 
  चूडा तो हाथी दांत का 
री ननदी  चूड़े  ने ले ली मेरी जान -
  चूडा  हाथी दांत का!!!!!!!!!!!!!!!!!!!



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धन्यवाद शब्द नगरी ----

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - ( सावन की सुहानी यादें -- लेख -) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन
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सोमवार, 30 जुलाई 2018

.विरह का सुलतान - पुण्य स्मरण --शिव कुमार बटालवी -- लेख |


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    पंजाब   का शाब्दिक अर्थ  पांच नदियों की धरती  है |   नदियों के किनारे अनेक सभ्यताएं  पनपतीहैं   और संस्कृतियाँ पोषित होती हैं  | मानव सभ्यता अपने सबसे वैभवशाली रूप में इन तटों पर ही नजर आती है क्योकि ये जल धाराएँ  अनेक तरह  से मानव को  उपकृत  कर मानव जीवन को धन - धान्य से  भरती हैं | |पंजाब को भी खुशहाल बनाने में इन नदियों का बहुत बड़ा हाथ है |इन नदियों से गीत  भी जन्मते हैं कभी ख़ुशी के तो कभी विरह के

 नदियाँ  स्वतः   गीत  नहीं गाती | उनके गीत कवि रचते हैं जिनमे जीवन केअनेक रंग परिलक्षित होते हैं |

   पंजाब की    धरती को  विशेष रूप  से उल्लास   की धरती माना जाता  है |    इसके लोग सदैव से ही  गीत और संगीत  के रसिया रहे है  |काल कोई भी हो और हालात जैसे भी हों यहाँ  गीत -संगीत का जादू हमेशा ही लोगों के सर चढ़कर बोला है | वारिस शाह , फरीद और  बुल्लेशाह जैसे सूफी कवियों से लेकर सिख धर्म के दस गुरुओं की वाणी गीत और शब्द रूप में इस धरा पर गूंजी है  | अपने अध्यात्मिकता के संदेश को  उसी माध्यम से लोगों के बीच  लोकप्रिय बनाया और नये  नैतिक   मूल्यों की स्थापना की |वारिस शाह से लेकर आज के आधुनिक कवियों ने पंजाबी सभ्याचार की   परम्परा को  चिरंतन रखते हुए जनमानस में अपना अहम स्थान बनाया है |इसी  क्रम में आधुनिक पंजाबी   साहित्य में जिस   कवि को पंजाबी साहित्य में  सर्वोच्च स्थान मिला  है , उनका नाम है  --शिवकुमार बटालवी | शिव को  वारिस शाह के बाद ये स्थान दिया गया | वे पंजाब के अकेले  ऐसे कवि रहे , जिनके गीत लोक गीतों की तरह लोकप्रिय और अमर हुए  और जिनके गीत गाना हर गायक अपना  सौभाग्य समझता था |      उन्होंने    अपने   समय  में अपार ख्याति तो पाई ही अपनी मौत के  लगभग पैंतालिस सालों के बाद भी     उनकी        लोकप्रियता   में कोई   कमी नहीं आई , |   उनके काव्य पर       शोध करने वाले छात्रों की संख्या  कभी  कम  नहीं रही  और ना ही  उनके काव्य    में कभी काव्य रसिकों की रूचि कम   हुई | उनकी दर्द भरी रूहानी शायरी ने उन्हें लोगों का महबूब शायर बना दिया |भारतवर्ष के  सबसे ज्यादा विवादस्पद कवियों में भी उनका नाम शुमार किया जाता है | पर इन सबके बावजूद कवि -समाज द्वारा उन्हें  उन्हें पंजाबी  के 'कीट्स 'की उपाधि दी गयी क्योंकि कीट्स की तरह ही उन्होंने अपने काव्य में ' रोमांटिसिज्म'को उत्कर्ष तक पहुंचाया- तो उनकी तरह ही अल्पायु में मौत पायी | पर उनकी कविताओं में  रोमांटिसिज्म  का मूल स्वर  वेदना का है . विरह    का है | वे  आजीवन प्रेम की तलाश भटकते एक ऐसे शायर थे जिन्होंने ना किसी छंद में  में बंध लिखा ना किसी रस्मो -रिवायत को मान लिखा   उन्होंने  कविता के क्षेत्र में व्याप्त मिथकों को दरकिनार कर   जिन नये बिम्बों  और  प्रतीकों का विधान किया उन्हें कोई  कवि   आज तक दुहरा नही पाया है |
उन्होंने' स्वछंद 'लिखा  , स्वछंद ही  गाया और स्वछ्न्द ही जीवन जिया ,जिसके लिए अनेक आलोचनाओं के प्रहार सहते हुए वे प्रसिद्धि के    ऐसे चरम पर बैठ गये जहाँ से  आज तक भी उन्हें कोई उतार नहीं पाया है |उनके लिखे काव्य की कोई  पुनरावृति  नहीं कर पाया  और ये हो भी नहीं सकती क्योकि  शिव ने जीवन में पग -- पग पर दर्द का  गरल निगला और  अमर काव्य  रचा |उनके आरे में अनेक तरह की कहानियां  कही  और सुनी जाती है | सच तो ये  है  कि उनका जीवन एक किवदन्ती  सरीखा हो गया है | क्योकि उनका जन्म अविभाजित   हिदुस्तान में हुआ था सो वे सीमा पार पाकिस्तान में भी समान रूप से लोकप्रिय हुए | शायद वह ऐसा दौर था    जब    दोनों  देशों के नये- ताजे बंटवारे के  बावजूद   , दोनों तरफ सांस्कृतिक सांझी विरासत की  आत्मीयता   बरकरार थी  और राजनैतिक  कलुषता  ने इस आत्मीयता को आच्छादित नहीं किया था |तभी वहां के अत्यंत नामी -गिरामी गायकों जैसे नुसरत फतेह अली खान और इनायत अली  इत्यादि ने उनकी रचनाओं को बहुत ही मधुरता से गाकर अमरत्व प्रदान किया |


 -- शिवकुमार     का जन्म 23 जुलाई  1936  को   गाँव  बड़ा पिंड    लोहटिया   शकरगढ़  तहसील में हुआ  |  अब  ये  जगह  पकिस्तान में है |वहां उनके पिताजी तहसीलदार थे जबकि माता जी  गृहिणी थी |  बंटवारे  के समय उनकी आयु  मात्र ग्यारह साल की थी | इस छोटी सी उम्र वे मन में अनेक जिज्ञासाएं मन में लिए माता - पिता और परिवार के साथ पंजाब के गुरदासपुर के बटाला  कस्बे  में आगये और अपना जीवन  का नया सफर शुरू किया |इसी कस्बे के नाम पर वे शिव कुमार बटालवी  के नाम से प्रसिद्ध हुए | 

पढाई के दौरान वे एक औसत विद्यार्थी रहे और     कई बार पढाई बीच में छोड़ कर अपनी  अस्थिर   स्वभाव  का परिचय दिया | वे अपने अन्तर्मुखी स्वभाव के कारण माता पिता के लिए चिंता का कारण रहे
 वे कला  विषय से बी ए करने लगे तो बाद में इंजिनियरिंग के डिप्लोमा के लिए हिमाचल के बैजनाथ चले गये तो उसके बाद पंजाब के नाभा  से स्नातक की डिग्री  लेने के लिए वहां के सरकारी कालेज में दाखिला ले लिया 
   |   जहाँ   मिलनसार स्वभाव  और कविता के शौक    ने उन्हें अपनी  मित्र- मण्डली   का चहेता बना  दिया | 1960में उनका पहला कविता संग्रह '' पीडां  दा परागा ''प्रकाशित हुआ उससे पहले ही  कवि दरवारों और कवि सम्मेलनों की   शान और जान बन चुके थे |कहते हैं दिग्गज कवि  आयोजको से  शिव  कुमार की प्रस्तुती सबसे बाद में   देने का   आग्रह करते थे क्योकि शिव को सुनने के बाद मंच पर सन्नाटे प्याप्त हो जाते थे | उनकी जोरदार प्रस्तुतियों के बाद लोग  अन्य  कवियों को सुनना पसंद नहीं करते थे |

 व्यक्तित्व ---शिव कुमार पर कविता के विषय में तो माँ सरस्वती की  असीम अनुकम्पा थी ही  उनके व्यक्तित्व में एक जादुई आकर्षण था | अत्यंत दर्शनीय  और  आकर्षक   व्यक्तित्व के स्वामी शिव   को   सूरत  और सीरत   दोनों   के अनूठे     मेल   ने  काव्य रसिकों  के सभी वर्गों में अत्यंत  लोकप्रिय  बना दिया था  पर महिला  वर्ग उनका खास तौर पर दीवाना था | यहाँ तक भी कहा जाता था  कि भले ही सभी  साहित्यकार उनकी प्रतिभा  का  लोहा मानते थे पर उन्हें अपने घर -परिवार से दूर ही रखने का प्रयास करते  थे  ताकि घर की महिलाएं उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व से  प्रभावित ना हो सके |पंजाब में ही नहीं पंजाब से बाहर रह रहे पंजाबियों  ने उन्हें सदैव ही सर माथे पर बिठा कर रखा और उनके रचे गीतों और कविताओं को विदेश में भी  लोकप्रिय  बनाया | विदेश में आज भी पंजाबी लोग उनके जन्मदिन 23 जुलाई को   ''बटालवी दिवस' के  रूप  में    मनाते हैं इससे बढ़कर  उनके प्रशंसकों का  प्रेम क्या होगा ? 


जीवन ---   जीवन -पर्यंत शिव का जीवन अनेक उतार - चढ़ावों से गुजरा |उन्हें जीवन  में कई बार प्रेम हुआ, पर वे उस प्यार को कभी अपने जीवन में अपना ना सके | उसके पीछे नियति तो कभी उनका अस्त - व्यस्त व्यक्तित्व रहा |   कहते हैं सबसे पहले जिन दिनों  वे माचल के बैजनाथ में पढ़ रहे थे उन्हें  मीना   नाम की अत्यंत  सुंदर ,सुशील  लडकी  से प्रेम हो गया | पर बाद में जब वे उसे अपनाने के लिए उसके घर पहुंचे तब तक  बुखार से उसकी मौत हो चुकी थी | उन्होंने  मीना   की याद में कई अमर गीत लिखे |  कॉलेज में पढ़ते हुए उन्हें एक     वरिष्ठ   कवि  की बेटी से प्रेम हो गया जो उनके जीवन में अंतहीन विरह का उपहार लेकर आया | पर उन दिनों वे एक   आम कवि की हैसियत रखते  थे सो वरिष्ठ कवि ने अपनी बेटी के भविष्य को सुरक्षित कर उसकी शादी    विदेश  में रह रहे एक सफल और  अमीर  लडके से कर दी | बाद में उन्होंने   भी अपनी प्रेमिका की शक्ल से मिलती जुलती लडकी से  शादी भी  की  और उनके दो बच्चे भी हुए  पर   उनके   मन को किसी तरह भी  रूहानी चैन  कभी नहीं  आ  पाया     | उनके पिता उन्हें कामयाब देखना चाहते थे अतः पिता की मर्जी के अनुसार उन्होंने कुछ समय तक पटवारी के रूप में भी काम किया पर बाद में वे स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया    चंडीगढ़  में जन सम्पर्क अधिकारी के बने  पर उनकी रूचि साहित्य में ही रही |और प्रेम की असफलता की कसक हमेशा उनके साथ रही |प्रेम की असफलता में टूट - बिखर कर शिव ने अनेक अमर प्रेम गीत  रचे  पर इसके साथ उन्होंने शराब को  भी  सदा के लिए गले लगा लिया | हितैषियों    और   परिवार  के समझाने का उनपर कोई असर ना हुआ | बाद में हालत ये हो गई कि लोग उनसे अच्छे गीत -ग़ज़लें सुनने के लिय उन्हें अपनी तरफ से पिलाने का इंतजाम करने लगे |कहते हैं अत्यंत नशे की हालत में वे अपने आप से बेखबर आत्म- मुग्धता में सर्वोत्तम काव्य रचने लगे | कई बार वे बेखबर हो दीवार पर गीत - गजल लिख देते और बाद में उनका भाई उन रचनाओं को कागज पर लिख  लेता |कविता उनके होठों से निर्झर की तरह बहती वे किसी भी विषय पर  रचना रचने में माहिर थे | अनेक ऐसे विषयों पर उन्होंने कवितायेँ लिखी जिन पर  कोई सोच भी नहीं सकता था | उनके गए गीत लोक गीत बन गये | लोग रचियता को नहीं जानते थे पर गली- गली  उनके गीत  मशहूर हो रहे थे | आज भी रेडियो पर उनके गीतों को सुनने के लिए श्रोताओं की फरमाइश में कोई कमी नहीं आई है और ये सदैव की तरह ही  सुनने  वालों के मनमे बसे हुए हैं | 

 रचना संसार  और सम्मान --- शिव कुमार  के रचना संसार में उनके  मन की विभिन्न  दशाएं तो मुखरित होती ही हैं साथ में उनके  दृष्टिकोण का भी पता चलता है |उन्होंने यूँ तो हर विषय पर लिखा पर  प्रेम उनकी कविताओं का प्रमुख विषय रहा उसमें भी प्रेम की असफलता  और विरह  प्रमुखता से मुखर हुई उनकी प्रमुख प्रकाशित रचना संग्रह के नाम इस तरह हैं --
 पीडांदा परागा  अर्थात दर्द का दुपट्टा ,  मुझे विदा करो , आरती , लाजवंती   आटे की चिड़िया , लूणा,  ममें और मैं , शोक , अलविदा  और बाद में अमृता प्रीतम  द्वारा  चयनित उनकी प्रमुख रचनाओं का संग्रह '' विरह का सुलतान ' है | कहते हैं उनके रचना संसार  में बहते दर्द के अविरल  भावों से  भावुक हो अमृता प्रीतम ने ही उन्हें विरह का सुलतान कहकर पुकारा था  जिस से उनका तात्पर्य था कि वे    दर्द  को बहादुरी से जीने  वाले  बादशाहसरीखे थे |   इन रचनाओं में उन्हें लोक कथा पूरण भगत के स्त्री - चरित्र  ''लूणा'' पर--- जो कि  एक काव्य  नाटक था ---1967 का पंजाबी  साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला  
 उस समय मात्र 27 साल की उम्र   में , वे इसे पाने वाले सबसे कम उम्र के कवि थे | कहते हैं एक पुरुष  होकर उन्होंने 'लूणा '' की अंतर्वेदना का बेजोड़ शब्दांकन किया था | इसमें  हिमाचल के चम्बा शहर और रावी  नदी खूबसूरती का बहुत ही  अच्छा वर्णन  है 
 उनकी अन्य रचनाओं में जीवन  के विभिन्न रंगों   के कुछ उदाहरण --

 अपनी रचना  - गमां  दी रात अर्थात गमों की रात में वे लिखते हैं -

ये  ग़मों की  रात लम्बी है या मेरे गीत लम्बे हैं -
 ना ये मनहूस रात खत्म होती ना मेरे गीत खत्म होते 
ये जख्म हैं इश्क  
के यारो -इनकी क्या दवा होवे  -
ये हाथ लगाये भी दुखते हैं  मलहम लगाये भी दुःख  जाते !!!!!

 एक  दूसरी रचना पंछी हो जाऊं में उन्होंने लिखा -

जी चाहे पंछी हो जाऊं -
उड़ता जाऊं - गाता जाऊं 
अनछुए शिखरों  को  छू पाऊँ 
इस दुनिया की राह भूलकर -
फिर कभी वापस ना आऊँ 
 बे दर - बेघर होकर-
 सारीउम्र पीऊँ रस गम का 
इसी नशे में जीवन जीकर -
जी चाहे पंछी हो जाऊं !!!!!
 उनकी अत्यंत  प्रसिद्ध    प्रतीकात्मक  मार्मिक रचना शिकरा यार में उनका दर्द यूँ छलका - 


 माये नी माये  मैं एक शिकरा  [ उड़ने वाला पक्षी]  यार बनाया
उसके सर पे कलगी
उसके पैरों में झांझर 
वो  तो  चुग्गा चुगता आया 
इक उसके रूप की  धूप  तीखी
 दूजा  उसकी महक ने लुभाया        --
तीजा उसका रंग गुलाबी 
वो किसी गोरी माँ का जाया |
 इश्क  का एक पंलग निवारी
 हमने चांदनी में बिछाया 
तन की चादर हो गयी मैली 
उसने पैर ना पलंग पाया -
दुखते  हैं मेरे नैनों के कोए
  सैलाब  आँसूओं का आया 
सारी रात सोचों में गई
उसने ये क्या जुल्म कमाया ?
सुबह सवेरे  ले उबटन -
हमने मल -मल उसे नहलाया -
देहि से निकले चिंगारें
हाथ गया हमारा कुम्हलाया 
चूरी  कुटुं  तो वो खाता  नहीं -
हमने दिल का मांस खिलाया |
एक उडारी ऐसी मारी 
वो  मुड वतन ना आया !!!!!!!!!!!!!!
 अपने खोये प्यार की याद में उनका अमर गीत - 

एक लडकी जिसका नाम मुहब्बत है -

गुम है , गुम है ,गुम है !!
-एक बेहद मकबूल गजल देखिये ---
मुझे तेरा शबाब ले बैठा -
रंग गोरा गुलाब ले बैठा 
कितनी पी ली  ,  कितनी बाकी है - 
 मुझे यही हिसाब ले बैठा ,
अच्छा होता सवाल ना करता -
मुझे तेरा जवाब ले बैठा ,
फुर्सत जब भी मिली है कामों से 
तेरे मुख की किताब ले बैठा .
मुझे जब भी आप हो याद आये -
 दिन दिहाड़े शराब ले बैठा !!!!!!!!

अपने एकअत्यंत लोक प्रिय गीत में वे लिखते हैं ---
 माये ना माये  मेरी  प्रीत  के नैनों में -विरह की रडक  पड़ती है 
सारी - सारी रात मोये  मित्रों के लिए रोते हैं  माँ हमें  नींद नहीं आती है
 सुगंध में  भिगो भिगो कर बांधूंफाहे चांदनी के -
तो भी हमारी पीड नहीं जाती 
गर्म गर्म सांसों  करूं जो  टकोर  माँ 
पर वो भी हमे खानें को पड़ती है !!!!!!
उन की  बहुत ही लोकप्रिय  रचना '' पीडां  दा परागा '' का भावार्थ कुछ यूँ है ---
ओ भट्ठीवाली तू पीड का परागा  भून दे 
मैं तुझे दूंगा  आसूंओं  का भाडा !!!!!!

 इसके अलावा उनके लिखे अनेक हल्के फुल्के लोक गीत भी  हैं जिन्हें  शादी ब्याह में  गाया जाता है | उनके गीतों को जगजीत सिंह , महेंद्र कपूर   , सुरेन्द्र कौर  , प्रकाश कौर  ,, आसा  सिंह  मस्ताना जैसे प्रसिद्ध गायकों  ने अपनी सुरीली आवाज देकर उनकी मधुरता  को बढाया और जन - जन तक पहुंचाया |

निधन -- उनकी कविताओं  में कई बार जीवन के प्रति अनासक्ति का भाव  मिलता है |  ''  वे अपनी रचनाओं  में बार बार यौवन में मरने की इच्छा जाहिर करते हैं क्योकि उन्हें विश्वास था कि युवावस्था में मरने वाले को भगवान  फूल या तारा बनाता है और वह लोगों की स्मृतियों में हमेशा युवा ही रहता है | शायद इसी लिए    उन्होंने    
 अपने   एक गीत   में लिखा ''किहमने तो जोबन   रुत में मर जाना  है   ''और उनकी यही इच्छा शायद ईश्वर  को भी मंजूर हो गयी | नशे की भयंकर लत  से उन्हें लीवर          सिरोसिस नामक रोग हो गया  जिससे उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि वे मतिभ्रम  का शिकार हो अपने अन्तरंग साथियों को भी  पहचान नहीं पाते थे | इसी असाध्य रोग से जूझते उन्होंने अपने ससुर के घर में 6  मई 1973   को अंतिम साँस ली | इसके साथ ही बहुत छोटी उम्र में मरने का उनकी चाह फलीभूत हुई  तो पंजाबी साहित्य का एक  चमकता सूरज  अस्त हो गया | पर अपनी मर्मस्पर्शी  रचनाओं के  माध्यम से  वे हमेशा अपने चाहने वालों  के मनों में बसते हैं  | 
आज उनके जन्म दिवस के अवसर पर उनकी पुण्य स्मृति को शत-शत नमन !!!!!!!
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पाठकों के लिए विशेष -- शिव कुमार बटालवी का अत्यंत प्रसिद्ध वीडियो जिसमे उनके सुदर्शन व्यक्तित्व के दर्शन तो होते ही हैं साथ में उनकी    ओज से भरी वाणी में उनका  प्रसिद्ध  गीत --
''क्या पूछते हो हाल फकीरों का ?हम नदियों से बिछड़े नीरों का ?

हम आसूं की जून में  आयों  का हम दिलजले दिलगीरों का 
हमें लाखों का तन मिल गया -पर एक भी मन ना मिला -
क्या लिखा किसी ने मुकद्दर था -- हाथों की चंद लकीरों का !!!!!!!    | उनकी  उनकी मासूमियत से भरी  बातों और उनमे  व्याप्त  सरलता के तो क्या कहने !!!!!  उनकी मौत से कुछ ही समय पहले लिया गया ये इंटरव्यू  हिंदी में हैऔर इसे बीबीसी द्वारा लिया गया था जो कि आंचलिक भाषा के  एक  कवि के लिए उन  दिनों अत्यंत गौरव का विषय था | सादर -- 




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 धन्यवाद शब्द नगरी ----


रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (विरह का सुलतान -- पुण्य स्मरण शिव कुमार बटालवी ) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
विरह का सुलतान -- पुण्य स्मरण शिव कुमार बटालवी



वाह!!प्रिय सखी रेनू जी ,एक महान व्यक्तित्व के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी पढकर बहुत ही। आनंद आया ....।,
Renuजुलाई  2018 को 1:28 am
प्रिय शुभा बहन -- आपने ब्लॉग पर आकर लेख पढ़ा मुझे अपार हर्ष हुआ | सस्नेह आभार आपका |  
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अन्तरिक्ष परी - कल्पना चावला

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