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मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

भूली बिसरी पाती स्नेह भरी --[ विश्व डाक दिवस ]



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विश्व डाक दिवस -- आज विश्व डाक दिवस है | इस दिन के बहाने से   चिट्ठियों के उस  भूले बिसरे संसार  में  झाँकने  का मन हो आया है  ,जो अब गौरवशाली अतीत  बन  गया है | भारत में राजा रजवाड़ों के समय में संदेशों का आदान - प्रदान  विश्वसनीय  सन्देशवाहकों के माध्यम से होता था  जो पैदल या घोड़ों आदि के माध्यम से अपनी सेवाएं देते थे  | लेकिन ब्रिटिश राज में 1864  में इस     व्यवस्था  को सुव्यवस्थित  ढंग से   शुरू  करने का प्रावधान किया गया  | आजादी से पहले और आजादी के बाद के   ढेढ़  सौ   से भी ज्यादा  सालों  में जनमानस से जुड़कर  डाक  विभाग  ने , लोंगों का  बहुत ही सम्मान और   स्नेह अर्जित किया है,  इसका कारण रहा डाक विभाग ने  समय के अनुसार  लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी   कार्य  -  प्रणाली में परिवर्तन करने से परहेज नहीं किया , जैसे  कल के कागजी  इतिहास  को छोड़कर डाक विभाग भी  डिजिटल  होने की पूर्णता के पथ पर अग्रसर है | पर पत्रों का वह स्वर्णिम इतिहास  भुलाये नहीं भूलता | 

पत्र भावनाओं  का   अहम  दस्तावेज -- पत्र सदियों से हर  आम और खास  के लिए अपने जज्बात जाहिर करने का सर्वोत्तम   माध्यम रहे है | किस्से कहानियों में सुना जाता है , कि पुराने समय में इंसानों के साथ -साथ    कबूतर  भी संदेश  इधर -उधर पहुँचाने का  काम किया करते थे|   पत्र  किसी भी विषय पर हो सकते  हैं,  पर   सदैव ज्यादा महत्व निजी पत्रों का ही रहा  मैं इन्हें आत्मीयता  के सघन उच्छ्वास  के नाम से पुकारना चाहूंगी क्योकि  निजी पत्र लेखन  में पत्र लेखक ने  सदैव ही     अपने निंतात  मौलिक  रूप का परिचय दिया | उसने वो लिखा जो उसने लिखना चाहा , बिना  लाग - लपेट  के |  अपनों  के प्रति वो जताया-जो मौखिक  रूप में कहना  कभी संभव ना होता |साहित्य में भी  पत्र लेखन को  अहम विधा मानकर उसे   सर्वोच्च स्थान दिया गया|
पत्र   पर कविता  उर शायरी खूब हुई  पर अनेक साहित्यकारों के पत्रों को  साहित्य में  वो स्थान मिला जो उनकी रचनाओं को भी नहीं मिला होगा |  कई साहित्य  साधकों ने   इन पत्रों को संजोने और संग्रहित करने का स्तुत्य प्रयास किया और  इस अनमोल थाती को आने वाली पीढ़ियों के लिए संभाल  कर रखा |  हिंदी की कहें तो हिंदी साहित्य में  आदरणीय  बनारसीदासचतुर्वेदी जी ने उत्तम  रचनाकारों के  पत्रों को सग्रहित करने के लिए  बाक़ायदा   '' पत्रलेखन  मंडल  '' की स्थापना की  जिसमे अन्य लोगों केअलावा हिंदी    के सशक्त हस्ताक्षर  माननीय शिवपूजन सहाय जी भी शामिल थे | उन्होंने विभिन्न साहित्यकारों के पत्रों को  संभालकर रखने और छपवाने में अहम्  भूमिका  अदा की|| उर्दू    साहित्य के  पुरोधा शायर     मिर्जा ग़ालिब , जिनका पूरा नाम  मिर्जा असदुल्लाह बेग खान  था ,  के पत्र उर्दू  साहित्य  के  अनमोल दस्तावेज माने जाते हैं | उनके बारे में कहा जाता है , कि शायर के रूप में   प्रसिद्ध ना भी होते तो  उनके पत्र  ही उन्हें  उर्दू साहित्य  में अटल  स्थान दिलाने के लिए  पर्याप्त थे |  इन खतों में उनके लेखन का उत्कृष्ट रूप नजर    आता है  जिनमे अनेक  अमर आशार इन्ही पत्रों के माध्यम  से कहे  गये|  विशेष लोगों  के साथ साथ आम लोगों ने भी  सदियों पत्र  लिखने ओर पढने के आनन्द को भरपूर जिया |
मोबाइल ने बदला परिदृश्य -------  जब तक आम जीवन में  सोशल  मीडिया  की घुसपैठ नहीं हुई थी - पत्रों ने  भावनाओं के अनगिन रंगों से जनमानस को खूब सराबोर किया |  तेजी से बदलते  समय    में भले ही आज हर   शहर  और  गाँव के प्रमुख कोने  पर मौन सा खड़ा डाक - विभाग का लाल डिब्बा अप्रासंगिक हो गया हो पर  किसी समय में इसका बहुत महत्व था | यदा - कदा  इसका  ताला खोलते ही डाक कर्मचारी की सांसे फूल जाती होंगी  -- इतनी डाक  के रूप में अनगिन चिट्ठियाँ  सँभालते || डाक विभाग के  इस अनथक कर्मी की भूमिका  सीमा पर   डटे  जवान  और  खेत में   जुटे  किसान से किसी भी तरह  कम नहीं थी | ठिठुरती ठंड हो या   चिलचिलाती  गर्मी  किसे भी मौसम में  इसका काम था लोगों तक समय पर  संदेश पहुँचाना

विशेष लोगों के निजी पत्र भी रहे उल्लेखनीय --   महात्मा गाँधी जी   के और लोगों के साथ अपनी पत्नी  कस्तूरबा गाँधी जी को लिखे निजी पत्र बहुत प्रसिद्ध हुए तो जवाहरलाल नेहरू जी  के अपनी सुपुत्री इंदिरा गाँधी  के नाम लिखे  पत्रों के माध्यम से हम उन्हें राजनेता की छवि से बिलकुल अलग  एक आम पिता के रूप में जान सकते हैं  कि  उनकी अपनी सुपुत्री से क्या अपेक्षाएं  थी और वह उन्हें   सही मार्ग पर चलने के लिए कैसे प्रेरित करना चाहते थे | इनमे से ज्यादातर पत्र नैनी जेल से लिखे गये | ये पत्र मूलतः अंग्रेजी में थे  ये जानना रोचक रहेगा कि  इन पत्रों का हिन्दी में अनुवाद  हिन्दी  के सुप्रसिद्ध  साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने किया था |स्वामी  विवेकानन्द के पत्र  भारत वर्ष की सांस्कृतिक धरोहर हैं | 


जुडी  अनेक यादें --- मुझे याद है      मेरी माँ ने पांचवी या छठी कक्षा  के दौरान , मुझे मेरी    बुआ जी  के पत्र के  प्रतिउत्तर  में पहली बार पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया |  बुआ जी ने  भी  उस अनगढ़ पत्र का उत्तर अत्यंत स्नेह  से दिया |  उसके बाद घर  की ओर से पत्राचार तकरीबन मेरे जिम्मे हो गया | घर के  अलावा -  हमारे गली पडोस में जिन  लडकियों की घर में  छोटी बहन नहीं थी - उनकी शादी के बाद  उनके लिए  पत्र लिखने का सौभाग्य भी मुझे ही  मिलता रहा |  मुझे याद है बचपन में हमारी तीनों    बुआ के पत्रों की हम किस तरह   राह देखा करते थे करते थे - जिनमे से दो बुआ की अत्यंत  सुंदर   लिखाई से ही  गाँव के डाकिया    चाचा  हमसे पहले ही बता देते थे कि हमारी कौन सी बुआ का पत्र आया है |  मेरे आंठ्वी  कक्षा और छोटे भाई के पांचवी कक्षा में  उत्तम परिणाम के साथ वजीफा अर्जित करने पर  हमारी छोटी बुआ जी ने  बम्बई से  भाई के लिए हाथ से बुना स्वेटर और मेरे लिए अलार्म घड़ी भेजी थी उसका  मुकाबला   अमेजोन  और   फ्लिप्कार्ट     से खरीदी गयी      महंगी  चींजे कभी नहीं  कर  कर  सकती |याद आता है मेरी दादी के नाम आया उनकी माँ द्वारा लिखा गया पत्र   जिसे वे अपने कीमती सामान की तरह   हाथी दांत की  नक्काशी वाली अपनी छोटी सी संदूकडी में  बड़े जतन से संभालकर रखती    थी  | उनके    दुनिया से जाने के बाद ये  अनमोल थाती मेरे पास सुरक्षित है |

हर नववर्ष  और  दीपावली पर   रंग बिरंगे कार्डों  का वो रोमांचक सतरंगी संसार   स्मृतियों  से कहाँ ओझल हो  पाता है ! कितनी उमंग  से अपनी  बुआओं , ननिहाल और सहेलियों के लिए अच्छे से अच्छा      शुभकामना संदेश वाला कार्ड ढूंढने की  वो  अनथक कवायद   इतनी   रोमांचक  थी कि उसके आगे     मोबाइल  व्हात्ट्स  अप्प और इंटरनेट के ईमेल सन्देश  बिलकुल फीके हैं  --  क्योकि  वे कार्ड और शुभकामना संदेश कुछ अपनों के लिये होते थे जिनमे  भावनाएं निर्झर सी बह  एक मन से  दूसरे मन  में  अनायास प्रवेश  कर  जाती थी , जबकि  आज  हर त्यौहार और नववर्ष के संदेश मात्र एक औपचारिकता बनकर रह गये हैं |  भले  इनमे से कुछ बहुत ही आत्मीयता के साथ भेजे जाते हों पर उनमे वो गर्मजोशी   नहीं है | डाकिया को शुभसमाचार लाने पर पुरस्कृत करने की उत्तम परम्परा का अलोप हो चुकी है|

बदली डाकिये की भूमिका --- बदलते समय में अब कोई पलक पांवड़े बिछाकर      डाकिये  का इन्तजार नहीं करता | उसकी बदली भूमिका में उसकी जगह   क़ानूनी  नोटिस  , नौकरी से संबधित  पत्र अथवा कोई जरूरी सामान का कोरियर  इत्यादि पंहुचाने के लिए सीमित  हो गई है | भावनाओं से भरे
पत्रों का भरा  डाकिये  का  थैला अब  बीते समय की     बात हुई |  नीले रंग  के अंतर्देशीय पत्र , पीलेरंग  के लिफाफे और रंगीन बॉर्डर से सजे  एरोग्राम अब  कहीं  देखने में नजर  नहीं आते |  कोने से  फटा  पोस्टकार्ड अब किसी के आकस्मिक निधन का दुखद  समाचार लिए  डराने  नही आता  -- अब तो किसी दुखद  घटना का समाचार   तुर्त- फुर्त फोन से  ही  मिल जाता है |

 इस  परम स्नेही  डाकिया   के   गौरवशाली अतीत को स्मरण  करते हुए  हमारे प्रबुद्ध  सहयोगी रचनाकार आदरणीय रविन्द्र सिंह यादव जी ने अत्यंत  भावपूर्ण कविता लिखी है जिसकी कुछ पंक्तियाँ साभार लिखना चाहूंगी --


कभी बेरंग खत भी आता था 
पाने वाला ख़ुशी से  दाम  चुकाता  था 
डाकिया सबसे प्यारा मुलाजिम होता था 
 राज़, अरमान  , राहत .   दर्द , रिश्तों की  फ़सलें बोता था 
डाकिया  चिट्ठी  तार पार्सल  रजिस्ट्री  मनीआर्डर लाता था 
डाकिया कहीं ख़ुशी कहीं  गम के सागर लाता था 

आज भी  डाकिया आता है  

 राहत कम आफत ज्यादा लाता है 
पोस्टकार्ड  नहीं रजिस्ट्री ज्यादा लाता है 
खुशियों का पिटारा नहीं 
 थैले में   क़ानूनी नोटिस  लाता है |  

फिल्मों  में मिला अहम स्थान --- फिल्मों  में भी    डाकिये को हमेशा   सर माथे पर बिठाकर  उसपर अनगिन गाने रचे गये तो खत  को भी फ़िल्मी गीतों में महत्वपूर्ण स्थान मिला' पलकों की छाँव में '' के मासूम    सरल ,   निश्छल   डाकिये    को कौन भुला पायेगा  जिसके '' डाकिया  डाक लाया '' गाकर   अलबेले  , मस्ताने  डाक बाँटने  के    अंदाज   ने  हर  सिने प्रेमी के मन में    अक्षुण  स्थान बनाया  , वहीँ '' नाम '' फिल्म के   नायक के साथ  अनगिन अप्रवासी  भारतियों को  अपनी मातृभूमि का स्मरण कराता गीत -- चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है ''    हिंदी सिनेमा के   सदाबहार  गीतों में शुमार किया जाता है | सरस्वती चन्द्र  के''  फूल तुम्हे भेजा है ख़त  में   '' , फिल्म कन्यादान  का कवि  नीरज द्वारा लिखा गया अमर गीत '' लिखे जो खत तुझे - वो तेरी याद में ''  और संगम  फिल्म  का '' ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ करके तुम नाराज ना होना '' प्रेमासिक्त मन की मधुर मनुहार है | इसके अलावा--   शक्ति फिल्म का '' हमने सनम को खत लिखा '' अपनी तरह का एकमात्र गीत है | इसी तरह तुम्हारी कसम फिल्म का --  ''हम दोनों मिलके कागज  पे दिल के - चिट्ठी लिखेंगे जवाब आयेगा ''  जिसे गीत सिने जगत की अनमोल थाती कहे जा सकते हैं , जो पत्रों के गौरवशाली अतीत  की गाथा बनकर सदियों हर दिशा  में गूंजते रहेंगे    और  इस 'ख़त  ' नाम के भावनाओं से भरे दस्तावेज के  अचानक  समय  के परिवर्तन  की लहर  के बीच विलुप्त हो  जाने के     कसकते अहसास को        याद दिलाते  रहेंगे |
एक चिट्ठी मेरी डायरी से -- 22 साल पहले मेरी शादी के बाद पहली बार जब मेरी बड़ी  बहन   की चिट्ठी  आई तो मायके की यादों से कसकते   भावुक  मन से मैंने उसे प्रतिउत्तर में एक कविता  लिख  दी जो मैंने संकोचवश  भेजी तो नहीं पर मेरी डायरी में पड़ी रही  जिसे  आज यहाँ लिखने का मन हो आया है ---

 फिर आज तुम्हारी पाती से -
 कई बिछुड़े पल याद आये ;
 जो जाके के लौट ना पाएंगे -
 वो परसों और कल याद आये |

भूल चली  थी जो गीत  कई -

 सहसा फिर से याद आये ,
 मुस्काए अधर भले बरबस    -
 पर   मेघ सजल नैंनों पर छाए 
 जो  पल - पल,मन महकाते हैं -
 खुशियों के कोलाहल याद आये !!


स्नेहिल स्पर्श वो माँ का 

 पल पल मन को छू जाता है ,
हूँ  दूर भले पर दूर नहीं -
ये चुपके से  कह जाता है;
 जो  स्नेहाश्रु छलकाते थे -
 वो नैना निर्मल याद आये !!

कागज के सीने से लिपटा -

 ये स्नेह तुम्हारा अनुपम है -
 इस ममता का ना मोल कोई-  
जग  सारा बाकि निर्मम है ;
इस प्यार को याद करूँ तो बस -
 माँ का  आँचल  याद आये !!!!!!


अंत में यही कहना चाहूंगी कि शायद इस सूचना  और तकनीकी क्रांति के इस युग में भी   भावनाओं की सुगंध  में भीगे पत्र    शायद कोई किसी   के नाम लिखता हो  और कोई एक तो शायद ऐसा जरुर होगा  जिसके नाम कोई   प्रेम भरी पाती  आई होगी |

काव्यांश ---- डाकिया   साभार-- /www.hindi-abhabharat.com
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धन्यवाद शब्दनगरी ---


रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (भूली बिसरी पाती स्नेह भरी --[ विश्व डाक दिवस ]) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन
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पाठकों के लिए विशेष -- कभी ख़त यूँ भी लिखवाये जाते थे-------   जिन्हें     डाक बाँटने   वाले अत्यंत   विश्वसनीय डाकिया बाबू ही लिखते थे | डाकिया बाबू को सांवरिया के नाम खत लिखने का  स्नेहिल  आग्रह  करती   ''आये दिन बहार के '' की     निर्मल मना  नायिका  के मधुर , सरस बोल  किसे भा ना जायेगें ---- जो कितने आग्रह से कह रही है --------
''  खत लिखदे सांवरिया के नाम बाबू -- कोरे कागज पे  लिखदे   सलाम बाबू -
वो जान जायेंगे पहचान जायेंगे--  कैसे होती है सुबह से शाम बाबू !!!!!!!!!!!!! ''
मेरा आग्रह जरुर सुने |



गुरुवार, 30 अगस्त 2018

अन्तरिक्ष परी - कल्पना चावला

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चित्र--- अपनी चिरपरिचित  गर्वित मुस्कान के साथ कल्पना चावला --
परिचय भारत  की अत्यंत साहसी और कर्मठ बेटियों  का जिक्र बिना  कल्पना चावला के कभी पूरा  नही  होता |  उन्हें  भारतीय मूल की पहली   महिला  अन्तरिक्ष -यात्री होने का  गौरव प्राप्त है|   कल्पना  चावला   भारतीय  नारी का वो चेहरा  है जिसने  अपनी विलक्षणता और  निरंतर लगन से अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर रहकर आम लड़की  को  नयी पहचान दी है | वे आम भारतीय परिवार में उस समय जन्मी जब  समाज में नारी की शिक्षा के प्रति  अधिक जागरूक नजरिया   नहीं था | आम परिवारों में उस समय बेटियों के सपनों का  कोई  मूल्य नहीं था |सपना भी इतना अद्भुत अर्थात  एरोनाटिक इंजिनियर    बनने का  , जो   उस समय  सिर्फ पुरुषों के वर्चस्व का क्षेत्र था   |  लेकिन कल्पना भाग्यशाली रही कि वे खुद तो बहुत ही लगन शील थी ही -उन्हें ईश्वर ने ऐसे माता  -पिता  भी  दिए,  जिन्होंने बेटी के सपनों को साकार करने में कोई  कसर नहीं छोडी  |    उन्होंने उसे अपने सपने साकार करने का पर्याप्त अवसर   और सहयोग दिया   |नारी के शनै - शनै  हो रहे उत्थानकाल में  वे  एक प्रेरणा पुंज की भांति  अवतरित हुई और देखते ही देखते  अपनी अद्भुत प्रतिभा के चलते -अपने नगर , राज्य  , और देश को छोड़कर कर  विश्व की समस्त   नारी जाति के लिए  एक आदर्श महिला बन गयी |उन्होंने अपनी अथक मेहनत से अपने सपनों की सबसे ऊँची उड़ान भरी | | कल्पना अपनी  जुझारू प्रवृति  के लिए तो  प्रसिद्ध है ,  साथ में अपनी सरलता और सादगी केलिए भी जानी जाती है |वे  एक गम्भीर श्रोता  और संकोची स्वभाव की मितभाषी   लडकी थी | उन्हें वैभवशाली जीवन से मोह नहीं था | 'सादा जीवन उच्च विचार 'की  परम्परा  का निर्वहन करते हुए उनकी दृष्टि   हमेशा   अपने लक्ष्य पर रही |उन्हें  ना  भौतिकता से  मोह था ,   ना किसी बनावटी जीवनशैली से |उनकी प्रतिभा के साथ - साथ उनकी सादगी   भी प्रेरक है | उन्होंने एक साधारण बालिका से  ले कर अन्तरिक्ष यात्री  का शानदार जीवन जिया और अपने जीवन को  हर स्वप्नदर्शी बालिका के लिए प्रेरणा  का प्रतीक बनाया |
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चित्र -- पति और परिवार के साथ कल्पना 
जीवन परिचय -  हरियाणा राज्य के छोटे से शहर  करनाल में 17 मार्च 1961 को  एक मध्यमवर्गीय परिवार में कल्पना का जन्म हुआ |  माता - पिता की चार संतानों में वे सबसे छोटी थी | उनके पिता  श्री बनारसी  दास  चावला और  माँ का नाम संजयोती  था |    कल्पना को बचपन में मोंटी नाम से पुकारा जाता था ,पर जब उन्हें  स्कूल में दाखिला ले दिलवाने के लिए ले जाया गया तो स्कूल की अध्यापिका ने उन्हें  उनके प्यार के नाम से अलग  तीन  सार्थक नाम  सुझाये,  जिनमे से उन्होंने 'कल्पना' नाम को चुना , इस तरह से --नन्ही मोंटू ' को   अपना ही चुना  'कल्पना ' नाम मिला जो उनके लिए  अत्यंत  शुभ और सार्थक रहा |अपनी उम्र के दूसरे  बच्चो से काफी भिन्न  कल्पना को  सितारों की दुनिया से  विशेष अनुराग था | अपने बचपन में वे अक्सर  छत पर बैठ विशाल आसमान को  निहारा करती  और उनकी ही कल्पना में गुम रहती | शायद उनका  सितारों की दुनिया से ये लगाव  ही -उनके   भविष्य के  जीवन के लिए कहीं ना कहीं  भूमिका   तैयार कर रहा था ,  साथ में  एक  दैवीय  संकेत भी था  कि उन्हें अंततः  किसी दिन इसी विराट अन्तरिक्ष का हिस्सा हो जाना था कल्पना चावला को शुरू से ही जे आर डी टाटा के जीवन ने बहुत ने बहुत प्रभावित किया और वे उनके बहुत बड़े  प्रेरणा स्त्रोत रहे |शुद इस लिए भी कि वे एक सफल उद्योगपति तो थे ही , साथ में एक सुदक्ष पायलट  भी थे और अपने अदम्यसाहस और जुझारूपन के लिए जाने जाते थे | सभाग्य से करनाल एक छोटा शहर होते हुए भी उन गिने  चुने  शहरों में से एक है जिसमे एविएशन क्लब था | कल्पना का मन  उस क्लब के छोटे -छोटे विमानों में यात्रा करने  को मचलता था | उनके पिताजी एक दिन उन्हें उनके भाई के साथ  छोटे से  विमान से  हवाई यात्रा करवाई |ये उनकी हवाई यात्रा का पहला अनुभव था |  शायद इसी रोमांचक अनुभव   ने कल्पना  को इस क्षेत्र  में आने के लिए निरंतर प्रेरित किया होगा| 
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चित्र --- कल्पना चावला  एक मनमोहक मुद्रा में 

शिक्षा --बचपन से  अत्यंत मेधावी छात्रा रही कल्पना  ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा करनाल के ही '' टैगोर बाल निकेतन  स्कूल  '' से पूरी की, जो आज भी अपने गौरवशाली इतिहास पर गर्वित कल्पना चावला के स्कूल के नाम से जाना जाता है  

 |उन्होंने पढाई के लिए कोई समझौता नहीं किया  |स्कूल के बाद उन्होंने  1982 में  चण्डीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से '' एरोनाटिकल इंजीनियरिंग '' की  डिग्री प्राप्त  की |डिग्री धारण  कर घरवालों के विरोध के बावजूद उन्होंने अमेरिका जाकर टेक्सास विश्विद्यालय से   एयरोस्पेस इंजिनीयरिंग  में  1984 में स्नातकोत्तर की डिग्री  ली |इसके बाद भी कोलराडो विश्वविद्यालय से एयरोस्पेस इंजिनीयरिंग  में  पी एचडी  हासिल  की | उन्होंने हवाई जहाज , ग्लाइडर, और  व्यावसायिकविमानचालक के लिए  लाइसेंस भी प्राप्त किये जो उन दिनों एक लडकी के लिए बहुत बड़ी  उपलब्धि थे | इस प्रकार वे निरंतर सफलता की सीढी चढ़ते हुए कल्पना उपलब्धियों के  नित नये आकाश  छू रही थी | 
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चित्र -- अंतिम यात्रा  के सहयात्री 
कार्य उपलब्धियां -- कल्पना ने पढाई के बाद 1988 में नासा के लिए काम करना शुरू कर दिया वे वहां एम्स  अनुसन्धान  केंद्र के लिए ''ओवेर्सेट मेथड्स इंक''    के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करने लगी  | 1996 में उन्हें अन्तरिक्ष यात्री कोर में शामिल कर लिया गया और वे अंततः वे एक अन्तरिक्ष यात्री के रूप में चुनी गयी | यहीं से कड़े  प्रशिक्षण के बाद उन्होंने  19  नवम्बर  1997 को छह सदस्यीय दल के साथ  अन्तरिक्ष  शटल कोलंबिया की फ्लाइट संख्या ''  एसटीएस-87 ''  से  अपनी पहली अन्तरिक्ष  उड़ान भरी |इस यात्रा के दौरान  कल्पना ने अपने साथी अन्तरिक्ष विज्ञानियों के साथ अन्तरिक्ष में 372 घंटे बिताये और अन्तरिक्ष  से पृथ्वी के  252चक्कर लगाये |इस दौरान उन्होंने अतरिक्ष की 1.04  मील की यात्रा की |ये दल 5 दिसम्बर 1997 को अपने   इस मिशन से वापिस आया | इस महत्वाकांक्षी उड़ान के बाद उन्होंने नासा  अन्तरिक्ष यात्री केंद्र में  विभिन्न तकनीकी पदों पर  कार्य  किया जिसके लिए उन्हें बहुत ही सराहना मिली और  उनके साथियों ने उन्हें विशेष पुरस्कार देकर सम्मानित किया |
कल्पना चावला भाग्यशाली रही कि उन्हें दूसरी बार फिर से अन्तरिक्ष यात्रा के महत्वकांक्षी मिशन के लिए चुना गया , जिसके जरिये  पृथ्वी  और अन्तरिक्ष विज्ञान , उन्नत विकास व  अन्तरिक्ष यात्री  स्वास्थ्य  व सुरक्षा का अध्ययन होना था | 
इस  उड़ान में कर्मचारी दल में उनके साथ   कमांडर रिक डी . हुसबंद, पायलट विलियम   स . मैकूल ,  कमांडर माइकल  पी  एंडरसन , इलान रामो  , डेविड म . ब्राउन और  लौरेल बी . क्लार्क नाम के सहयात्री भी थे | 16जनवरी 2003 को कोलम्बिया शटल के जरिये ही  मिशन '' एस टी एस 107'' का आरम्भ हुआ | इस यात्रा में कल्पना के जिम्मे  अहम जिम्मेवारी थी | लघु गुरुत्व पर  इन यात्रियों ने  80 प्रयोग किये जिसकी जानकारी ये नासा को भेजते रहे | पर इस यात्रा के साथ ही कोलम्बिया विमान और इन यात्रियों की यह आखिरी यात्रा साबित हुई | 1 फरवरी 2003 को पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते समय ये अन्तरिक्ष यान दुर्घटना ग्रस्त हो गया और उसमे सवार इन सभी सातों होनहार वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की मौत हो गयी | उस समय इस शटल  की  धरती से दूरी    मात्र 63  किलोमीटर थी |     कहते हैं कल्पना चावला का कथन था , '' कि मैं अन्तरिक्ष के लिए ही बनी हूँ मेरा प्रत्येक पल अन्तरिक्ष के लिए है और इसमें ही विलीन हो जाऊंगी'' | उनका ये कथन उनकी  उनकी  दुखद मौत के बात एक कटु सत्य में बदल गया |  कल्पना चावला के साथ ये  अन्तरिक्ष यात्री मानवता के लिए अहम अनुसन्धान का योगदान देकर अनंत में विलीन हो गये | 
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पुरस्कार और सम्मान --- कल्पना चावला को मरणोपरांत अमेरिका  में अनेक पुरस्कार से सम्मानित किया गया जिनमे 

   कांग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान, नासा अन्तरिक्ष उडान पदक, नासा विशिष्ट सेवा पदक इत्यादि शामिल हैं | इसके अलावा उनके नाम पर अमेरिका और भारत दोनों में अनेक  महत्वपूर्ण  योजनायें  चलाई  गयी हैं जिनका लाभ अनेक  छात्र - छात्राएं ले रहे हैं  | अमेरिका की कुछ सम्मान  योजनायें    इस तरह हैं -   भारतीय छात्र संघ द्वारा टेक्सास विश्वविध्यालय में मेधावी छात्रों के लिए कल्पना चावला स्मृति छात्रवृति पुरस्कार  के साथ इसी  विश्वविध्यालय में उनके नाम से एक हाल  का नामकरण किया गया   | यहाँ     से उन्होंने स्नाकोत्तर डिग्री हासिल की थी  |न्यूयार्क शहर  में जेक्सन हाइटस  क्वींस स्ट्रीट    74 का  , 74 कल्पना चावला  के नाम से पुनः नामकरण किया गया है | फ्लोरिडा प्रद्योगिकी संस्थान  के छात्र परिसर में  कोलम्बिया यान के  दिवंगत  सातों यात्रियों के नाम पर एक -एक विद्यार्थी परिसर  का नाम रखा गया है | नासा ने एक  सुपर कंप्यूटर को कल्पना नाम देकर  कल्पना चावला को सम्मानित किया है | 
इसके अलावा भारत ने भी अपनी बेटी को नहीं भुलाया है और उनके सम्मान को अक्षुण रखने के लिए अनेक योजनायें जारी की | केंद्र के साथ - साथ  हर राज्य  सरकार  उनके नाम पर  पुरस्कार और  अन्य महत्वपूर्ण प्रोत्साहन योजनायें चलाई  हैं | इनमे से कुछ इस तरह हैं | पंजाब विश्वविद्यालय में लडकियों के एक छात्रावास का नाम कल्पना  चावला के नाम पर है साथ में उनके नाम पर होनहार छात्र - छात्राओं के लिए कईनकद पुरस्कार  शुरू किये है |कर्नाटक सरकार ने युवा महिला  वैज्ञानिक के लिए कई नकद पुरस्कार  स्थापित किया गया है | कुरुक्षेत्र ज्योतिसर में स्थापित तारा मंडल का नाम  कल्पना चावला के नाम पर  रखा  गया है ,तो  इसरो के मौसम विज्ञान सम्बन्धी उपग्रहों का नाम भी कल्पना के नाम पर रखा गया है |माध्यमिक बोर्ड  ने भी होनहार छात्रों  के लिए उनकी स्मृति - स्वरूप छात्रवृति  की शुरुआत की गई| इन योग्नाओं से लाभ लेने वाले छात्र  अवश्य ही उनके जीवन  से प्रेरणा ले कुछ अच्छा  करने के लिए होंगे |
 | यूँ उन्हें  प्रतिभावान पलायनवादी  भी कहा गया   और उनपर  आरोप लगता रहा कि वे भारत की नहीं अपितु अमेरिकी  नागरिक की हैसियत से अन्तरिक्ष यात्री बनी |पर भारत में आजतक मात्र एक पुरुष राकेश शर्मा को ही अन्तरिक्ष में जाने का  सौभाग्य  मिला है |यहाँ रहकर शायद ही वे वो मुकाम हासिल कर पाती जो उन्होंने अमेरिका में जाकर प्राप्त किया | अमेरिका जैसे सुविधा संपन्न देश सदैव से ही  प्रतिभाओं  को हाथोहाथ लेते रहे हैं चाहे वे किसी भी देश से क्यों ना हों | और भारत में भ्रष्टाचार और भाई  भतीजावाद  की नीतियाँ किसी से छिपी नहीं है | ऐसे में एक महत्वकांक्षी लडकी का बेहतर भविष्य के लिए विदेश जाना कोई अनुचित नहीं दिखायी  पड़ता  |

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चित्र -- पति जे पी हैरिसन के साथ कल्पना--
 निजी जीवन और भारत यात्रा --- कल्पना  चावला को एम् टेक की पढाई के दौरान फ़्रांस  के नागरिक जों पियरे हैरिसन  से प्रेम हो गया जिससे बाद  में उन्होंने शादी कर ली  |जों अमेरिका में ही प्रशिक्षक थे |वे कल्पना  की सादगी भरे  संस्कारों  से इतना प्रभावित हुए  कि उन्होंनेसमस्त भारतीय  संस्कारों सेइतना प्रभावित हुए कि उहोने  समस्त भारतीय संस्कारों के साथ शाकाहार भी हमेशा के लिए अपना लिया | 1991 में  दोनों  को अमेरिकी नागरिकता मिल गयी | |वे अंतिम बार 1991 -1992 की नव वर्ष की छुट्टियों  में भारत अपने पति और परिवार के साथ आई   थी |उनकी मौत के बाद  करनाल व अन्य  जगहों पर , उनकी स्मृति में  आयोजित किये गये श्रद्धान्जलि    समारोहों  में उनके पिता, पति और अन्य   परिवारजन  विशेष रूप से शामिल हुए थे |


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 चित्र ००० करनाल में कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज और  अस्पताल  
 कल्पना और करनाल ------ यूँ  तो करनाल की अपनी एतहासिक और पौराणिक पहचान है |इसे महाभारत के प्रसिद्ध पात्र कर्ण की नगरी के नाम से जाना है और आधुनिक सन्दर्भ में कहें तो एशिया का सबसे बड़ा   डेरी अनुसंधान जिसे NDRI के नाम से जाना है , भी यहीं स्थित है ,पर     कल्पना चावला ने इस शहर को वैश्विक  स्तर पर अलग ही पहचान दिलवाई है | अब इसे संसार भर में  बस  कल्पना चावला के जन्म स्थान के रूप में  ही ज्यादा जाना जाता है |उनके पिताजी की करनाल में कपड़े की दूकान थी | बाद में  उनका परिवार यूँ तो करनाल छोड़कर दिल्ली बस गया था , पर कल्पना ने भारत के साथ- साथ अपनी जन्म भूमि करनाल को कभी नहीं बिसराया | विद्यार्थियों के वैज्ञानिक  उत्थान के लिए शुरू की गयी नासा यात्रा में पूरे हरियाणा से दस  विद्यार्थी  प्रतिवर्ष नासा जाते हैं ,जिनमे से दो छात्र कल्पना चावला के स्कूल ' टैगोर बाल निकेतन 'से होते हैं | जो बच्चे कल्पना के जीवन काल में नासा गये उन्हें वे विशेष तौर पर अपने घर आमंत्रित कर करती और  अपने हाथों से खाना बनाकर खिलाती | आज भी उनके स्कूल में उनकी  स्मृतियों को नमन करते हुए  उनकी पुण्यतिथि और जन्म - दिन  पर कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं | बच्चे उनके स्कूल में पढ़ खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं |  टैगोर बाल निकेतन की प्रिंसिपल माननीया पुष्पा रहेजा इस बात पर गर्व अनुभव करती थी, कि उनके स्कूल की एक ही छात्रा ने उनके साधारण स्कूल को असाधारण बना दिया | उनके  सहपाठी  उन्हें  बहुत ही भावपूर्ण ढंग से याद करते हैं |हरियाणा सरकार ने  भी अपनी   प्रतिभाशाली और लाडली  बेटी के सम्मान में करनाल के  सरकारी   अस्पताल और मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर  - क्प्ल्पना चावला अस्पताल करदिया है  जो  कि चण्डीगढ़ के  स्नातकोत्तर संस्थान अर्थात PGI के  समकक्ष माना  गया है | इस भव्य अस्पताल में  मरीजों के उपचार के लिए हर आधुनिक सुविधा मुफ्त में मौजूद है और भविष्य के चिकित्सक भी यहाँ प्रशिक्षित होने शुरू हो गये हैं |

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चित्र -- अबोध बचपन में कल्पना 

मौत भी रही विवादों में -- कल्पना चावला की मौत भी विवादों से  दूर नहीं रही | कोलम्बिया यान की दुर्घटना के बाद नासा के'' मिशन कोलम्बिया 'के  प्रोग्राम मैनेजर  वें हेल  की मीडिया रिपोर्ट के  अनुसार कल्पना और उनके सहयात्रियों की मौत उसी दिन तय हो गयी थी जिस दिन उन्होंने अन्तरिक्ष के लिए संयुक्त उड़ान भरी थी | नासा को पता चल गया था कि यान में मात्र 15दिन के लिए ही ऑक्सीजन है | पर अपनी मौत से बेखबर ये अभागे वैज्ञानिक अपने अनुसन्धान की पल पल रिपोर्ट नासा को भेजते रहे | नासा ने अपनी विवशता जताई , कि उन्हें सचाई बताकर भी कोई लाभ होने वाला नहीं था | उन्होंने स्वीकारा ये एक तरह से सातों अन्तरिक्ष यात्रियों की मौत की साजिश थी | नासा ने इस विवाद पर कभी कोई सफाई नहीं दी है पर  इस  विवाद  से अनेक प्रश्न उठ खड़े होते हैं |
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चित्र -- एक प्रेरक मुस्कान 

एक प्रेरक जीवन -- तमाम विवादों के बावजूद कल्पना चावला का जीवन समस्त भारतीय नारियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत है | सितारों की दुनिया  में उनकी संकल्प -गाथा अमर और अटल है | उनका दृढ निश्चय और निरंतर कर्म - पथ पर अग्रसर  हो , सफलता प्राप्त करने की कहानी अपने आपमें  समाज और नारी जगत में एक नयी आशा का संचार करती है | निराशा में उनका जीवन हमेशा एक प्रेरणा पुंज बनकर जगमगाता रहेगा |

समस्त चित्र-- गूगल से साभार 

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धन्यवाद शब्द नगरी -------

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (अन्तरिक्ष परी - कल्पना चावला ) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
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भूली बिसरी पाती स्नेह भरी --[ विश्व डाक दिवस ]

विश्व डाक दिवस --  आज विश्व डाक दिवस है | इस दिन के बहाने से   चिट्ठियों के उस  भूले बिसरे संसार  में  झाँकने  का मन हो आया है  ,जो अब ...