नमस्कार -- माँ सरस्वती के चरणों में कोटिश नमन करते हुए मेरा नया ब्लॉग ,ब्लॉग जगत को समर्पित है | इस ब्लॉग की सभी रचनाएँ गद्य विधा में होगी | आशा है साहित्य मित्रों का पूर्ववत सहयोग मिलेगा |
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बात जनवरी 1992 की है जब मैं अपनी बुआ जी के यहाँ अम्बाला कैंट गई हुई थी | उन दिनों मेरे फूफाजी , जो मर्चेंट नेवी में काम करते थे , भी घर आये हुए थे | इसी बीच उनके साथ उनके एक रिश्तेदार के यहाँ शादी में अम्बाला शहर जाने का अवसर मिला | शादी रात में थी | शादी में ही फूफा जी के दूसरे रिश्तेदार चौहान साहब और उनकी पत्नी मिल गये | यूँ तो वे पास के गाँव के रहने वाले थे लेकिन क्यूँकि दोनों कामकाजी थे इसलिए वे अम्बाला में ही रहते थे उनका घर यहाँ शादी वाले घर से ज्यादा दूर नहीं था | वे फूफा जी को अपने घर आने का आग्रह करने लगे जिसे फूफा जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया | हम तीनों उनके साथ उनके घर पहुंचे तब तक रात के बारह बज चुके थे | चौहान साहब ने जैसे ही घर के दरवाजे की घंटी बजाई उनकी माँ ने दरवाजा खोला ,जो इन दिनों गाँव से उनके घर रहने आई हुई थी | उनकी माँ को देखकर सब हैरान और परेशान हो गये | लग रहा था वे अभी -अभी नहाकर आई हैं | जनवरी की कंपकंपाती ठण्ड में भी उन्होंने बहुत ही घिसा -पिटा सा सूती सूट पहन रखा था जोकि उनके सिर के बालों से टपकते पानी से बिलकुल तर हो उनके बदन से चिपका हुआ था | वे मानो नींद में चल रही थी |चौहान साहब की पत्नी ने तत्परता से उन्हें संभाला और पूछा कि वे इस समय क्यों नहाई ? वे समय जानकर बहुत ही लापरवाही से बोली कि उन्हें लगा सुबह के पांच बजे हैं इसीलिये वो नहा आई | चौहान साहब की की पत्नी ने अंदर के कमरे में ले जाकर उन्हें ऊनी कपडे पहनाये और बाल सूखे तौलिये में लपेटकर उन्हें सुखाया | साथ में हम सभी को बाहर वाले कमरे में बिठाकर सबके लिए चाय बनाने चली गई| इस कमरे की सामने की दीवार पर एक अत्यंत युवा लडके की बड़ी सी हार चढी फोटो टंगी थी | यूँ तो फूफा जी पहले से ही जानते थे पर चौहान साहब बताने लगे कि वह चित्र उनके दिवंगत छोटे भाई ऋषिपाल का था जिसकी मौत आकस्मिक सडक दुर्घटना में आठ वर्ष पूर्व हो गयी थी | माँ तब से विचलित थी और कोई भी सांत्वना उन्हें उस दुखद याद से मुक्त नहीं कर पायी थी | माँ उस मर्मान्तक घटना को कभी भी भूल नहीं पाई | हालाँकि वे उसी दिन से शहर के अत्यंत जाने माने मनो चिकित्सक से उनका इलाज भी करवा रहे हैं पर वे ऋषिपाल को कभी भूल नहीं पाती क्योकि वह तीन भाइयों में सबसे छोटा और संबका लाडला था | खुद चौहान साहब के अपनी कोई संतान नहीं थी अतः वे अपने इसी भाई को अपनी संतान की तरह मानते थे और पढने- लिखने के लिए प्रोत्साहित करते थे | | इसी बीच उसका चयन वायुसेना में हो गया . जिसके लिए उसे दो दिन बाद ही ट्रेनिंग पर जाना था पर जाने से पहले ही सड़क दुर्घटना में उसकी जान चली गयी |सब बातें बताते हुए उनकी आँखें नम होती रही | इसी बीच माँ नाजाने क्यों मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अंदर अपने कमरे में ले गई | उनका कमरा सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा था | साफ सुथरे बिस्तर के अलावा दवाई और पानी के साथ माँ की जरूरत की हर चीज वहां मौजूद थी | इस कमरे में भी उनके दिवंगत बेटे की एक और मुस्कुराती हुई तस्वीर मेज पर उनके बिस्तर के बिलकुल सामने रखी थी | वह अचानक ना जाने किस रौ में तस्वीर में अ अपने दिवंगत बेटे के चेहरे को सहलाती हुई मुझे बताने लगी कि उनका बेटा ऋषिपाल उस दिन उन्हें कहकर गया था कि बाद कुछ देर बाद आ रहा हूँ पर वो निष्प्राण होकर लौटा !! वह मुझे बहुत ही व्यथित हो बताती गई कि जिस घड़ी वो शहर जाने के लिए तैयार हुआ घर की मजबूत दीवार अपने आप दरक गई और घर के सामने खड़े आम के पेड़ की सबसे मोटी डाली ना जाने कैसे अनायास टूट कर धरती पर गिर पड़ी | माँ की आँखें कौतूहल और अनजाने डर से फैलकर आज भी उस दृश्य को मानो सजीवता से अपने आगे ही देख रही थी और आत्म मुग्धता की स्थिति में वे कहती जा रही थी कि उस दिन कोई आंधी तूफ़ान नहीं आया तो कैसे दीवार और आम की टहनी टूट गई थी !! मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था उन्हें क्या कहूं !!! मैं निःशब्द बैठी उन्हे एकटक निहार रही थी और उनकी करुणा से भरी बातों से मेरे भीतर एक वेदना पसरती जा रही थी | वे उस पल के पास आज भी उसी तरह से जुडी बैठी थी मानो ये अभी इसी पल की बात हो | लाडले बेटे शादी के सपने , हंसी खुश मिजाजी के दृश्य और माँ को लाड मनुहार के कितने ही दृश्य कुछ ही पल में उनकी बातों में साकार हो गये | उनकी सब बातें मेरी आँखें नम किये दे रही थी पर इस दौरान अपने मुंह से सांत्वना का एक भी शब्द उनके लिए कह पाने में खुद को असमर्थ पा रही थी | इसी बीच मेरी बुआजी ने मुझे बाहर आने के लिए कहा क्योकि रात के दो बजने वाले थे और हमें वापिस घर जाना था | हमने चौहान साहब और उनकी पत्नी के साथ माँ से भी विदा मांगी | पर माँ निर्विकार शून्य में तकती रही और हम वहां से बोझिल मन लेकर निकल चल पड़े | कितने साल बीत गये पर मुझे बेटे की यादों में खोयी वह स्नेही माँ कभी नही भूलती जिन्हें कोई सांत्वना उनके बेटे की यादों से दूर नहीं ले जा पाई | | उसी समय इन्ही माँ पर एक कविता लिखी थी -- जिसे यहाँ लिख रही हूँ | माँ अब तक रोती है माँ अब तक रोती है उस युवा अनब्याहे बेटे की याद में - चला गया था आठ साल पहले जीवन के उस पार अचानक जो कहकर गया था आ रहा हूँ पल दो पल में . पर आई थी उसकी निर्जीव देह ' माँ स्तब्ध है उसी पल से और रातों को नहीं सोती है !! बिन तूफ़ान के ही आम की मोटी टहनी का टूटना या फिर दरक जाना अचानक आंगन की मजबूत दीवार का ; सब उसकी मौत की आहट तो नहीं थी ? उसके हंसते विदा होने पर अंतिम बार भीतर लरज़ी थी कोई डरावनी लहर सी ; क्यों वह अनुमान ना लगा पाई थी अनहोनी के घटने का ! पछतावे में माँ पल -पल गलती है ! और अब तक रोती है !! पिता भूल चुके हैं - भाई मगन हैं अपनी गृहस्थी में बहनें अक्सर राखी पर कर लेती हैं आँखें नम ; पर माँ को याद है बिछड़े बेटे का हंसना ,मुस्कुराना और लाड में भर माँ के पीछे -पीछे आना , उसका सेहरा देखने का अधूरी चाहत अब भी कसकती है मन में; उस जैसा कोई मिल जाए - हर चेहरे में झांकती माँ ढूंढती अपना खोया मोती है | माँ अब तक रोती है !!!!!!!
जीवन में बसंत --- चारों ओर बसंत का शोर है | हो भी क्यों ना !जीवन में बसंत का आना असीम खुशियों का परिचायक है | प्रश्न उठता है बसंत क्या है ? क्या है इसकी परिभाषा ?यूँ तो बसंत को हर किसी ने अपनी परिभाषा दी है पर सरल शब्दों में कहें तो फूलों की खिलना ही सृष्टि में बसंत का परिचायक है , ये मन की वेदना को चीरकर निकली एक आशा उम्मीद का प्रतीक है | बुझे मन के पतझड़ में एक ख़ुशी की कामना ही बसंत है | बसंत आया तो सृष्टि मानों सोते-सोते आँखें मलती जग पडती है| कितना कुछ अनोखा सा घटित होता प्रतीत होता है | | ठण्ड में सिमटे दिनों का आकार बढ़ता है तो सुहानी सी भोर के साथ गर्माहट भरी धूप मन को एक नयी चेतना से भर असीम आनन्द की अनुभूति करवाती है | आकाश की नील आभा और गहराती प्रतीत होती है तो पक्षियों के दल पूरी क्षमता से मानों आकाश से होड़ लगाते दिखते हैं | बासंती बेला में नील गगन में रंग बिरंगी पतंगों का उड़ना उत्साह के चरम का द्योतक है |ठूंठ प्रकृति में नवयौवन की आहट जड़ता में चैतन्य लाती है |जो वृक्ष - पौधे , लताएँ पतझड़ में पत्रविहीन हो निर्जीव ,उदासीन और उजड़े से नजर आते हैं वही बसंत के आते ही स्वर्ण , ताम्र और रजत वर्णी नव कोपलों से सुसज्जित हो बसंती बयार के संग झूम झूम कर इतराने लगते हैं | यही है बसंत जिसे सृष्टि के छः ऋतुओं का शिरोमणि कहा गया है |हवा भी बहुत सुहानी और मादक हुई जाती है मानों जीवन से पीड़ा विदा हो गयी और अनंत आनन्द दस्तक दे रहे हों | नवागत ऋतु की पदचाप भर से जीवन की निष्क्रियता - सक्रियता में बदलने को आतुर हो उठती है | मयूरों का नर्तन , भवरों का गुंजन और कोयल की कूक मानो इसके स्वागत का मधुर गान है | आम के पेड़ों पर उमड़ी मंजरी और नीम के सफेद फूलों से महकती गलियां तो कहीं गेंदे के फूलों की कतारें देखते ही बनती है बसंत में चार चाँद लगाने के लिए होली , फाग , रसिया जैसे लोकरंग इसमें समाहित हो जाते हैं तो इसका लालित्य बढ़ाने के लिए फगुवा के आह्लादित स्वर चारो दिशाओं में गूंजने लगते हैं |ये लोकजीवन का वो रंग है जो हर मन की कलुषता को धोकर समाज में आपसी सौहार्द की भावना को बढ़ाने में अपना अभूतपूर्व योगदान देता है
फूलों की बहार के क्या कहने -- इन सबके बीच में जो पूरी क्षमता से अपने अस्तित्व का आभास कराते हैं --वो है फूल !|इनके माध्यम से ही तो जीवन गा उठता है | फूल ही तो हैं जो खिलकर , झूमकर --अलसाई सृष्टि में एक जागरण का गान रचते हैं |ये मानव मन की अधूरी कामनाओं की पूर्णता का प्रतीक बन खड़े हो जाते हैं | ये ना होते तो मधुमास की परिभाषा ही अधूरी रहती | इनके बूते ही तो बसंत को ऋतुराज कहकर सृष्टि ने सर माथे पर बिठाया है | सच है फूलों का खिलना ही तो सृष्टि का बसंत है| फूल जीवन से इसी तरह जुड़े हैं, जैसे देह से प्राण | फूल सब अनकहा कहने में सक्षम है | प्रेम ,समर्पण , विश्वास सब भावनाएं फूलों के माध्यम से बड़ी सरलता से व्यक्त हो जाती हैं| ये सकारात्मक ऊर्जा से भर मन को नई उमंग से भर देते हैं| फूलों से मन्त्र मुग्ध दिशाएं और सुगंध से सराबोर वसुंधरा नये रंगों में सजकर बासंती परिधान धारण कर इतराती सी नजर आती है | -
कहाँ नहीं हैं फूल ?--- जहाँ तक नज़र जाती हैं फूल दिखायी पड़ते हैं | इस पूरी सृष्टि में कहाँ नहीं हैं फूल ? पहाड़ों -पर्वतों की घाटियों में , जंगल में , उपवन में , रास्तों पे , क्यारियों में ., खेतों में , जल में थल में -- कौन सी ऐसी जगह है जहाँ फूलों ने अपना वर्चस्व स्थापित ना किया हो | कौन सा ऐसा मौसम है जब किसी तरह के फूल ना खिलते हों | भले बसंत और पावस ऋतु में इनका यौवनकाल होता है |पर फागुन में नीम के सफ़ेद फूलों की मादक गंध से महकती गलियों का अपना ही आनन्द है तो बसंत में गेंदे के पौधे पर लगे फूल तो महकते ही हैं, साथ में उसके पत्ते भी हवा को सुवासित कर इसकी मादकता को बढ़ाने मे अपना अतुलनीय योगदान देते हैं | शीतकाल में गुलाब , पारिजात , चमेली , रात रानी , डेहलिया गुलदाउदी इत्यादि सब फूलों की अपनी गंध है और अपनी ही प्रकृति जो अपनी नैसर्गिकता से जीवन में ख़ुशी का संचार करते हैं | सर्द ऋतू में सरसों के बासंतीफूलों का अपना महत्व है | होली के रंगों से अबीर बनाने के लिए ही मानों टेसू को ईश्वर ने उसी मौसम का राजा बनाया है ,तो गर्मी बढ़ने के साथ - सब फूलों के मुरझाने के बाद हर नजर में गुलमोहर ही छाया रहता है | इस तरह हर मौसम के अपने फूल हैं अपनी गंध है और अपना ही मिज़ाज़ है |फूलों के रंग , आकार कीकहें तो जितने फूल उतने ही कलात्मकता से भरपूर | सृष्टा की ये अनुपम रचनाएँ सदैव ही विस्मय से भरती हैं और कई अनुत्तरित प्रश्नों को जन्म देती हैं | सब वनस्पति जड़ सी थी -पर जैसे ही ऋतुराज आया -- नए कलेवर में सज संदेश देने लगी | लगा मानो जीवन से पीड़ा विदा हो गयी और अनंत आनन्द दस्तक दे रहे हों | नवागत ऋतु की पदचाप भर से जीवन में नया उल्लास और कामनाओं का उजास छा जाता है | फूलों की अपनी दुनिया है -- कहा जाता है कि दुनिया में फूलों के ढाई लाख से भी अधिक पौधों की प्रजातियाँ पायी जाती हैं | फूलोंकी अपनी दुनिया है जो कौतूहल से भरी है और बहुत अनूठीकही जा सकती है |जैसे कमल का फूल सूर्योदय के समय खिलता है तो सूर्यास्त के साथ मुरझा जाता है | ये फूल अपने सौन्दर्य के साथ लिए कलात्मकता के बारे में भी जाना जाता है | सूरजमुखी के फूल का मुंह प्रातः काल सूरज की और होता है तो शाम को पश्चिम की ओर हो जाता है | इस तरह से ये फूल अपने नामको सार्थक करता है | छुई- मुई नामक पौधे की पत्तियां हाथ से छूते ही सिमट जाती हैं | चन्द्र पुष्प नाम का फूल केवल रात में ही खिलता है और दिन में बंद हो जाता है |गुलाब की पन्द्रह सौ से ज्यादा प्रजातियाँ उगाई जाती हैं और ये पुष्प शायद विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय फूलों में से एक है जिसे प्रेम प्रतीक माना गया है | गुलाब के नाम पर गुलाब दिवस यानी रोज़ डे भी मनाया जाता है | ट्यूलिप नामक फूल को भी प्रेम , विश्वास और अमरता के फूल के रूप में जाना जाता है | इसके बारे में एक रोचक जानकारी भी है कि 1960 के दशक में ये सोने से भी ज्यादा कीमती माने जाने लगे थे | इसके अलावा ये भी जानना चाहिए कि एक चम्मच शहद बनाने के लिए एक मधुमक्खी लगभग दो हजार फूलों से पराग और रस लेती है | फूलों के बारे में एक और रोचक तथ्य सामने आया है कि रंगीन फूलों से ज्यादा सुगंध सफेद फूलों में होती है | कोमलतम भावों के प्रतीक -- फूलों से कोमल दुनिया में क्या ? इसी लिए इन्हें कोमलतम भावों का प्रतीक माना गया है | इन्हें प्रेम की तरह ही पावन और ह्रदय के सबसे समीप मना गया |गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर लिखते हैं '' फूल की पंखुरियों को तोड़ कर तुम उसका सौन्दर्य ग्रहण नहीं कर सकते |''अर्थात फूल की सार्थकता उसके खिलने में है नाकि उसे तोड़कर संग्रहित कर लिए जाने में | बुद्ध भी प्रेम को फूल की संज्ञा देकर कहते हैं जिस तरह से फूल खिलता है तभी सुगंध देता है इसी तरह से प्रेम भी जब तक उन्मुक्त रहता है तब तक फलता -फूलता है | उसे समेटने में वह मुरझा जाता है |मूर्धन्य कवि जयशंकर प्रसाद लिखते हैं '' फूल प्रकृति की उदारता का दान है | इन्हें सूंघने से ह्रदय पवित्र होता है , मेधा शक्ति बढती है और मस्तिष्क प्रफुल्लित होता है |''सच है सुगंध का विराट वैभव समेटे पुष्प मानव मन की हर मौन कोमलतम अभिव्यक्ति का मुखर रूप हैं |
उत्तम औषधि भी हैं फूल -- फूल केवल सुंगध ही नहीं देते बल्कि ये औषधीय गुणों से भरपूर भी होते हैं | इनमें मौजूद पोषक तत्व कई मानसिक और दैहिक रोगों को दूर करने में सक्षम होते हैं | आयुर्वेद में तो सूरजमुखी से लेकर नीम . गुलाब ,पारिजात , सदाबहार , गेंदा , चमेली , गुडहल . इत्यादि को प्रमुखता से उपयोगी माना गया | फूलों के बारे में स्वीकार किया गया है कि इनमें शरीर के लिए फ़ाईबर, कैल्शियम , विटामिन , प्रोटीन इत्यादि भरपूर मात्र में होते हैं , जो शरीर को कोई भी हानि पहुंचाए बिना बीमारियों से दूर रखने में सहायक सिद्ध होते हैं | इत्र के रूप में फूलों के रस के प्रयोग की परम्परा बहुत पुरानी है तो आधुनिक युग में अरोमा थैरेपी के रूप में फूलों का प्रयोग बहुत चलन में है | ये थेरेपी तन मन को नयी ऊर्जा से भरने में बहुत कारगर सिद्ध हुई है | मनोवैज्ञानिक तो बड़े विश्वास से ये कहते हैं कि प्रकृति के समीप रहने से बढ़कर तन मन की बीमारियों का कोई उपचार नहीं है | उसमें भी फूलों के नजदीक रहना और उन्हें सहलाना बहुत ही चमत्कारी सिद्ध हो सकता है कह सकते हैं फूलों में शुभ स्वास्थ्य का निवास है
पग- पग पर उपयोगी -- इसके अलावाजीवन में हर कदम पर फूल उपयोगी हैं | गंध ,रंग के अलावा हर अवसर पर इनका महत्व है |मंदिर में देवताओं की पूजा अर्चना हो या शादी ब्याह में दूल्हे के सेहरे की सजावट और पंडाल का सौंदर्यीकरण सभी जगह फूलों की जरूरत पडती ही | यहाँ तक कि जन्म के उत्सव से लेकर अर्थी तक की जीवन यात्रा में फूलों का साथ बना रहता है |पौराणिक काल से ही , बालों की वेणी हो या अन्य पुष्प आभूषण - फूलों को नारियों ने बड़े ही चाव से अपने तन पर सजाया है | आजकल भी शादी ब्याह में लडकियों द्वारा विभिन्न अवसरों पर फूलों के गहने पहनने का चलन बढ़ता जा रहा है | इसके अलावा --किसी को दोस्ती का आमन्त्रण देना हो , इज़हारेमुहब्बत करना हो , किसी को शुक्रिया कहना हो या फिर किसी से क्षमा याचना करनी हो फूल से बेहतर कोई उपहार नहीं | सामाजिक व्यवहार को बढ़ाने में फूलों का अहम् योगदान हो सकता है | जड़ सोच को बदलने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है | खास मौकों पर खास लोगों को फूलों का तोहफा देकर हम अपनी अनकही भावनाएं उन तक पंहुचा कर उनके और निकट आ सकते हैं | फूलों से किसे प्यार नहीं और कौन इनका तलबगार नहीं !
समभाव के प्रतीक हैं फूल -- फूलों के जीवन से प्रेरक कुछ भी नहीं | ज्यादातर फूल अल्पजीवी होते हैं पर अल्प से जीवन में ही वे समभाव से महकते , मानवता के लिए एक अनुपम संदेश छोड़ जाते हैं | खुद निष्काम रह , दूसरों के लिए अपना सर्वस्व लुटाना कोई फूलों से सीखे | हर मौसम की क्रूर मार झेलते , इन्सान की स्वार्थी प्रवृति को दरकिनार करते हुए और कीड़े मकोड़ों के साथ तितली ,भंवरे इत्यादि का अनचाहा जबरदस्ती प्रेम सहन करते हुए हमेशा खिलखिलाने का मधुर स्वभाव फूलों के अलावा किसी और का नहीं हो सकता | वे किसी सम्राट के महल में उसी भाव से खिलते हैं जिस भाव से किसी पर्ण -कुटीर में |कंटीली झाड़ी की सेज पर भी इन्हें मुस्कुराने से कोई नहीं रोक सकता | | किसी अमीर-गरीब, ऊंच- नीच का भेद इनके लिए नहीं है |इनकी सुगंध सबके लिए बराबर है
फूल गेंदवा ना मारो - | बात फूलों की हो और सिने जगत इससे अछूता रहे , ऐसा कभी नहीं हो सकता | आम जीवन की तरह फिल्मों में भी फूलों को विशेष महत्व मिला है | रजत पट पर दर्शकों को लुभाने के लिए नायक नायिका के प्रेम दृश्य को स्वाभाविकता देने के लिए फूलों से भरी वादियों में फिल्माया गया तो नायिका के सौन्दर्य का बखान करने के लिए फूलों से उसकी तुलना गयी |कितने ही अमर गीत फूलों की महिमा पर रचे गये और सिनेमा जगत में छा गये | जिन्हें आम जन ने सुनाऔर वे हमेशा के लिए उसके मन की अभिव्यक्ति का प्रतीक बन कर रह गये | ये फूलों की सुगंध की तरह ही जीवन में महकते है और मन को अप्रितम आनन्द से भर जाते हैं | प्रेम पुजारी में नीरज लिखते हैं -- ;; फूलों के रंग से दिल की कलम से तुझको से लिखी रोज पाती '' तो सरस्वती चन्द्र में इन्दीवर ने-- '' फूल तुम्हे भेजा है ख़त में '' लिखकर --- प्रेमियों के ख़त में फूल भेजने के ढके लिपटे रहस्य को आम कर दिया | दूज के चाँद का '' फूल गेंदवा ना मारोलगत करेजवा में चोट ; में विरह की अनकही कसक सिमट अमर हो गयी है | जितनी फ़िल्में उतने गीत और उतने ही भावनाओं के रंग | कोई कहाँ तक कहे और कहाँ तक ना कहे | साहित्य के चहेते रहे हैं फूल -- साहित्य में फूलों पर अनगिन गीत लिखे गये कवितायेँ रची गयी तो ललित निबन्धों की भी कमी ना रही | यूँ तो आदिकाल से आधुनिक काल तक फूल साहित्य में अक्षुण रहे पर छायावादी , प्रकृतिवादी , प्रेम वादी और रहस्यवादी कवियों ने तो फूलों की महिमा पर खूब और अद्भुत लिखा |फूलों पर कुछ मनमोहक ,अमर पंक्तियाँ--- पतझड़ था सूखे से झाड खड़े थे क्यारी में - किसलय दल कुसुम बिछाकर आये तुम इस क्यारी में !! [ जयशंकर प्रसाद ] धूप में ये अनुष्टुप सा कौन खड़ा है ? यह वनस्पति पुरुष क्या केवल फूल ही है ? [ नरेश मेहता ] गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले [ फैज़ अहमद फैज़ ] फूल हंसो - गंध हंसो , प्यार हंसों तुम हंसिया की धार - बार बार हंसों तुम ! [ कैलाश गौतम ] फूल पौधों की सुगन्धित प्रार्थना है अथवा धरती को कहीं से भी छुओ एक ऋचा की प्रतीति होती है !! [श्री नरेश मेहता ] अजब मौसम है, मेरे हर कद़म पे फूल रखता है मुहब्बत में मुहब्बत का फरिश्ता साथ चलता है
[ बशीर बद्र ]
दो गुलाब के फूल छू गए जब से होठ अपावन मेरे ऐसी गंध बसी है मन में सारा जग मधुबन लगता है। [ कवि नीरज ]
इसके अलावा महादेवी वर्मा की --''मुरझाया फूल '' ,माखन लाल चतुर्वेदी जी की '' पुष्प की अभिलाषा '' और आमिर खुसरो की -- ''सकल बन फूल रही सरसों ''जैसी रचनाएँ और आदरनीय हजारीप्रसाद द्विवेदी. जी का ''अशोक के फूल' पर निबन्ध जैसी कृतियाँ साहित्य जगत की अनमोल थाती हैं |
इस तरह फूलों के बिना जीवन की कल्पना करना बहुत ही निरर्थक है | सांस्कृतिक , सामाजिक जिअवं में इनका योगदान अतुलनीय है साथ में ये अपनी उपस्थिति से मन को एक अप्रितम आह्लाद से भर एक विराट सुकून की अनुभूति कराते हैं |
और अब अंत में मेरे ब्लॉग से फूलों को समर्पित एक रचना बसंत गान मेरी भी -- हंसो फूलो -- खिलो फूलो - डाल-डाल पर झूलो फूलो ! उतरा फागुन मास धरा पर - हर रंग रंग झूमो फूलो !! गलियों में सुगंध फैलाओ, भवरों पर मकरंद लुटाओ ; भेजो आमन्त्रण तितली को - ''कि बूंद - बूंद रस पी लो'' फूलो ! ! हंसों के नीम -आम बौराएँ - खिलो के कोकिल तान चढ़ाए , महको - महके रात संग तुम्हारे - घुल पवन में अम्बर छूलो -फूलो !! बासंती अनुराग जगाओ - सोये प्रीत के राग जगाओं ; हंसो !हँसे नैना गोरी के - साजन संग इन्हें पिरो लो फूलो !! धरा परिधान सजाये बहुरंगी, नभ इन्द्रधनुष सा हो सतरंगी ; तुमसे सब रंग सजे सृष्टि के - ये इक बात ना भूलो ! फूलो !! हँसो !हँसे आँगन की क्यारी , खिलो !खिले भोर मतवाली ; महको ! समय बहुत कम तेरा - कुछ पल में जीवन जी लो फूलो !!!!!!!
पाठकों के लिए विशेष -मेरा हार्दिक आग्रह जरुर सुने -------- मख़दूम मोइनुद्दीनकी फूलों सी महकती सदाबहार गज़ल जो मन को बहुत सुकून देती है ------------- फिर छिड़ी रात बात फूलों की ,
रात है या बारात फूलों की !! फूल के हार - फूल के गजरे, शाम फूलों की ,रात फूलों की !! आपका साथ -साथ फूलों का , आपकी बात बात फूलों की !! फूल खिलते रहेंगे दुनिया में , रोज़ निकलेगी बात फूलों की !! नजरें मिलती हैं जाममिलते है मिल रही है हयात फूलों की , ये महकती हुई गज़ल मकदूम जैसे सेहरा में रात फूलों की !!
साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है | वो इसलिए समय के निरंतर प्रवाह के दौरान साहित्य के माध्यम से हम तत्कालीन परिस्थितियों और उनके प्रभाव से आसानी से रूबरू हो पाते हैं | सब लोग हर दिन असंख्य लोगों की समस्याओं और उनके जीवन के सभी रंगों को देखते रहते हैं शायद वे उनके बारे में सोचते भी हों पर उनकी पीड़ा उनकी खुशियों को शब्दों में व्यक्त करने का हुनर हर इंसान में नहीं होता , ये कार्य एक कलम का धनी इंसान ही बखूबी कर सकता है | आज रचनाधर्म से जुड़े अनेक लोगों की रचनाएँ हमारी नजर से गुजरती हैं | उनके विषय अनेक हो सकते हैं और उनके भीतर के स्वर भी अलग -अलग भावों में गूंथे होते हैं | अमूमन हर कवि या साहित्यकार की शुरुआत प्रेम विषयक रचनाओं से शुरू होती है | उसके अस्फुट स्वर प्रेम को रचने के लिए लालायित रहते हैं जो सपनों की दुनिया में लेजाकर कुछ पल को पढ़ने और लिखने वाले को अपार सुकून देता है | पर कुछ ऐसे रचनाकार भी होते हैं जो किसी के दर्द को देख कभी खाली नहीं लौटे और उस दर्द को उन्होंने अपने अंतस में संजो इसकी वेदना अनुभव करने के बाद -- शब्दों में पिरो अनगिन लोगों तक पहुंचाने का स्तुत्य प्रयास किया है | ध्रुव सिंह 'एकलव्य 'एक ऐसे ही रचनाकार हैं ,जो समाज के शोषित वर्ग की वेदना की जड़ तक पहुंच उसे रचना में ढालने का हुनर रखते हैं | | ध्रुव सिंह 'एकलव्य ' जी की रचनाओं से मेरा परिचय शब्द नगरी के मंच पर हुआ जहाँ मैंने उनकी पहली रचना पढ़ी तो मैं बहुत प्रभावित हुई, क्योंकि एक अत्यंत युवा कवि से बहुत ही संवेदनशील कविता की उम्मीद प्रायः नहीं होती पर ध्रुव जी का लेखन बहुत ही सधा और शब्दावली प्रगतिवादी कवियों की याद दिला रहा था | उस रचना के बाद भी मैंने उनकी कई रचनाएँ और पढ़ी , सभी बहुत ही उम्दा थी और चिंतन परक थी | बाद में जब मैंने जुलाई 2017 में अपना ब्लॉग बनाया तो पता चला , कि अपने ब्लॉग के माध्यम से ध्रुव जी बेहद सजग और धारदार लेखन कर ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान रखते हैं साथ में साहित्य में नयी प्रतिभाओं को खोजकर लाने में निष्पक्ष और प्रभावशाली चर्चाकार की भूमिका अदा कर रहे हैं | मैंने ब्लॉग पर उनकी जितनी भी रचनाएँ पढ़ी-उनमे कवि समाज के उन पात्रों पर पैनी दृष्टि से अवलोकन कर मंथन और चिंतन करता है जो सदियों से समाज द्वारा दमित औरउपेक्षित है | पिछले दिनों 'एकलव्य ; जी का प्रथम काव्य संग्रह -- ''चीख़ती-आवाज़ें '' अस्तित्व में आया जिसे पढ़ने का मुझे भी सौभाग्य मिला | इस पुस्तक से मुझे एक कवि की प्रखर अंर्तदृष्टि से रूबरू होने का अवसर मिला | इस पुस्तक में शामिल रचनाओं के माध्यम से मेरा प्रकृति और प्रेम की दुनिया से कहीं दूर संवेदनाओं के ऐसे संसार का परिचय हुआ जो मन को झझकोरती हैं | सभी रचनाओं में समाज के शोषित वर्ग की एक मार्मिक तस्वीर सजीव हुई है | सभी विषय समाज में अनदेखी का शिकार वो करूण पात्र हैं ,जिन्हें दुनिया ने सदैव अपनी ठोकर पर रखा | संभ्रांत वर्ग ने जिनके श्रम के बूते खुशहाल जीवन जिया , लेकिन खुद उनकी पीढियां इसी उम्मीद में खप गईं कि उनका जीवन बेहतर करने कोई मसीहा आयेगा , पर ऐसा कोई भाग्यविधाता उनका भाग्य संवारने कभी नहीं आया | सत्तायें बदली , समय बदला लेकिन इन अभागों के नसीब नहीं | | उनके प्रति एक युवा कवि ने एक सूत्रधार की भूमिका निभाई है जो उनका दर्द दुनिया को सुनाना चाहता है , उनकी कहानियां अपनी रचना में रच उनके जीवन का कड़वा सच सबके आगे प्रकट करना चाहता है | ये अति संवेदन शील रचनाएँ सोचने पर विवश करती हैं कि हम किस समाज में जी रहे हैं ? इस सुसभ्य और सुशिक्षित दुनिया में अभी भी इस शोषित , दमित वर्ग को औरों की तरह जीवन जीने का अधिकार कब मिलेगा ? इस पुस्तक को पढ़ने के दौरान मेरा मन अनेक तरह की संवेदनाओं और चिंतन से गुजरा जिसका अनुभव मैं अपने सहयोगी रचनाकारों और पाठकों के साथ बांटना चाहती हूँ |
पुस्तक परिचय -- काव्य संग्रह '' 'चीख़ती-आवाज़ें ' में ध्रुव सिंह जी की 42 काव्य रचनाएँ संगृहित की गयी हैं पुस्तक की भूमिका ब्लॉग जगत के सशक्त रचनाकार और प्रखर चिंतक आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी ने लिखी है जो पुस्तक के मर्म को उद्घाटित करते हुए पाठकों के समक्ष एक विराट चिंतन का विल्कप संजोती है | पुस्तक की भूमिका निहायत शानदार बन पड़ी है, जो पाठकों को पुस्तक पढने के लिए प्रेरित करने में सक्षम है | तत्पश्चात ध्रुव जी ने मात्र कुछ शब्दों में अपने लेखन को परिभाषित करते हुए इसे अपना सामाजिक कर्तव्य मानते हुए अपना सुस्पष्ट आत्म कथ्य लिखा है ,जिसमे उन्होंने अपने भीतर व्याप्त नैतिक मूल्यों का श्रेय अपने पिताजी के अनुशासन और न्यायप्रियता के अक्षुण प्रभाव को दिया है | पुस्तक में छपे उनके परिचय से ज्ञात होता है स्वयं एक कृषक परिवार से होने के कारण कवि कृषक वर्ग की दुविधाओं और पेशेवर विसंगतियों से बखूबी वाकिफ है | उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत उनके विद्यार्थी जीवन के दौरान काशीहिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण से हुई - जिसे साहित्य और दर्शन की उर्वर भूमि कहा जाता है |वहां से शुरू हुआ सफर दिनोदिन उनके सतत अभ्यास और प्रयास से निखर रहा है ,जिसका एक सुंदर पड़ाव इस पुस्तक के रूप में आया है |पुस्तक की कई रचनाएँ नारी विमर्श को समर्पित है जो विभिन्न नारियों के जीवन में व्याप्त पीड़ा और संघर्ष के रूप में शब्दों में व्यक्त होते हैं तो कभी मन को भिगोते हैं तो कभी उसकी जीवटता पर उसे नमन करने को बाध्य करते हैं | पुस्तक की पहली ही रचना '' मरण तक '' में कवि ने बीडी बनाने के लिए पत्तों को ले जाती एक महिला पात्र का मर्मस्पर्शी चित्र शब्दों में उकेरा है जिसे ट्रेन के सफर के दौरान देखकर उसके बदन से उठती दुर्गन्ध से नाक सिकोड़ते लोगों से उसका कहना है कि आज वे लोग भले ही उसे देखकर नाक भौं सिकोड़ रहे हैं | कल बीडी के रूप में इन पत्तों से धुंए के छल्ले उड़ाते हुए उन्हें इस दुर्गन्ध का एहसास नहीं रहेगा अपितु उन्हें वह तब एक सुन्दरी सी नजर आयेगी | वह कहती है -- बाबूजी मत देखो | विस्मय से मुझे और मेरी दुर्दशा जो हुई उन पत्तों को लाने में | आग में धुआं बनाकर जो लेगें कभी तब दिखूंगी | सुन्दरी सी मैं !!!!!!!!!! एक अन्यरचना '' जुगाड़ '' में आकंठ गरीबी में डूबी माँ के जाते यौवन और अनायास खो गयी रूप आभा को बहुत ही मार्मिकता से प्रस्तुत करते कवि लिखता है - यौवन जाता रहा - झुर्रियां आती रही बिन बुलाये हर रोज आकस्मिक बुलाया मेहमान की बनकर प्रसन्न थे हम दिन प्रतिदिन खो रही थी वो हमें प्रसन्न करने के जुगाड़ में !!!!!!! एक अन्य रचना '' सती की तरह ' में एक नारी के अन्तस् की घनीभूत पीड़ा को बड़ी स्पष्टता से शब्द दिए हैं समाज ने उसे अदृश्य वर्जनाओं में जकड़ उसके मूक और बन्ध्या रूप को ही सदैव मान्यता दी है |हर दौर में उसके सती रूप को ही पूजनीय और सम्मानीय समझा गया , जिससे बाहर आने पर उसके समर्पण की गरिमा खंडित मानी जाती है | वो बड़ी वेदना से कहती है -- मुख बंधे हैं मेरे समाज की वर्जनाओं से खंडित कर रहे है - तर्क मेरे वैज्ञानिकी सोच रखने वाले अद्यतन सत्य , भूत की वे ज्योति रखने वाले : इसी तरह ''महाप्राण निराला '' की मूल रचना वह तोडती पत्थर की नायिका को आधुनिक सन्दर्भ में एक नई सोच के साथ प्रस्तुत करते हुए कवि ने अपनी रचना ''फिर वह तोडती पत्थर '' में नैतिकता मापदंडों से दूर जाने की विवशता को उकेरते लिखता है अब तोड़ने लगी हूँ जिस्मों को उनकी फरमाईशों से भरते नही थे की तुडाई से ; अंतर शेष है केवल कल तक तोडती थी बे - जान से उन पत्थरों को | अब तोड़ते हैं , वे मुझे निर्जीव सा पत्थर सा समझकर !!!! श्रम से जीवन यापन करती एक श्रमी नारी को जीवन मूल्यों की आहुति दे अपने दैहिक शोषण के साथ जीना कितना दूभर होता होगा ये रचना उस सच्चाई से रूबरू करवाती है | रचना ''सब्जी वाली '' में नायिका दुनिया की कुत्सित निगाहों का शिकार होती है-- हर रोज़ और हर पल | लोग सब्ज़ी से ज्यादा उसकी आकर्षक देह -यष्टि अवलोकन करते हैं | वह आक्रांत हो वेदना भरे स्वर में कह उठती हैं -- सब्जियां कम खरीदते हैं लोग मैं ज्यादा बिकती हूँ !! नित्य , उनके हवस भरे चेहरे हंसती हूँ केवल यह सोचकर बिकना तो काम है मेरा कौड़ियों में ही सही | कम से कम चौराहे पर बिक तो रही हूँ , ओ ! खरीदारों ! एक अन्य मर्मस्पर्शी रचना ' दीपक जलाना ' में शिक्षा के अभाव में नर्क भोग संसार से विदा होती बेटी की शिक्षा की अनंत कामना को पिरोया गया है जो बहुत ही मार्मिक शब्दों में माँ से अनुरोध करती है कि स्कूल की किताबों से भरे बैग टांगे मेरे कांधों पर | दूसरा जन्म हो , इस तरह विश्वास दिलाना माँ दीपक जलाना ! क्योंकि बेटी को पता है इस नरक से बचने का उपाय एक मात्र शिक्षा है| उसे मलाल है कि काश ! माँ ने चौके के बर्तन थमाने के स्थान पर उसके हाथों में कलम पकडाई होती | एक नन्ही बालिका मुनिया अपनी बकरी को अपने रूप में देखती अपनी ' मुनिया समझती है और उसके बड़ा ना होने की कामना करती है | ये समाज में जी रही हर बालिका के मन की असुरक्षा को इंगित करता है | समाज का सबसे शोषित पात्र '' बुधिया '' अनेक रूपों में रचनाओं के माध्यम से साकार होता है | सड़क बनाने वाले मजदूर के हिस्से में भरसक मेहनत के बावजूद भोजन के रूप में दो जून की सूखी रोटी ही आती है | एक रचना में उसकी करुण-गाथा का एक अंश ---- पाऊंगा परम सुख सुखी रोटी से फावड़ा चलाते हुए उबड खाबड़ रास्तों पर | समतल बनाना है |सडक दौडती - भागती चमचमाती जिन्दगी के लिए जीवन अन्धकार में , स्वयं का रखकर | किसान' बुधिया 'की वेदना को उसके खेत के हरे भरे धान भी अनुभव करते हैं , जो अपने हाथों से खेत में घुटनों तक पानी में उन्हें रोपता है और उनकी लहलहाती फसल को नम आखों से निहार कर खुशहाली के सपने सजाता है | वे उन परदेसियों के आगमन से भयभीत है जो उन्हें लेजाने आयेंगे | वे डरे से कहते है डरे भी हैं| प्रसन्न भी कारण है वाज़िब परदेसियों के आगमन का | मेहनत बिना ले जायेंगे हमको हाथों से हमारे पालनहार के , जिन्हें हम 'बुधिया ' बाबा कहते हैं | तो कहीं ऊँची अट्टालिकाओं से बहिष्कृत एक आम आदमी 'बुधिया 'जो फूटपाथ पर आकर खुली हवा में चैन की नींद में सोया है ,का सुकून भरा दर्द पिरोया गया है | विडम्बना है , कि किसी समय वह इसी फुटपाथ पर कूड़ा फैंका करता था जहाँ आज उसे सोने के लिए खुली फिज़ां मिली है | वह इस का पता बताने वाले इन्सान का शुक्रिया अदा करता हुआ कहता है -- भला हो उस इंसान का बताया जिसने इस फुटपाथ का पता मेरी ही चार मंज़िलों के नीचे दुबका पड़ा था जो | कल परसों कूड़ा फैंका करता था जहाँ | 'बुधिया ' सोता है वहीँ |चैन की नींद , हमारी फैंकी हुई दो रोटी खाकर बड़े आराम से | पेट की भूख ही सब गुनाहों और सांसारिक कर्मों का मूल है | अगर ये ना हो तो कोई मजदूरी सरीखा असाध्य का कर्म क्यों करने पर विवश हो ? यही प्रश्न करता एक आक्रांत श्रमिक -- बुझ जाए ये आग सदा के लिए ताकिआगे कोई मंजिल निर्माण की दरकार ना बचे कभी | अंत में यही कहना चाहूंगी कि भौतिकता की दौड़ में अंतहीन मंजिलों की ओर भागते युवाओं के बीच एक अत्यंत प्रतिभाशाली युवा कवि का समाज के विषय में ये संवेदनाओं से भरा चिंतन शीतलता भरी बयार की तरह है , जो ये सोचने पर विवश करता है कि हम क्यों समाज का वो सच देखने की इच्छा नहीं रखते -जो हमारे आँखें फेर लेने के बावजूद भी समाज का सबसे मर्मान्तक सच है | कवि ने उस नंगे सच को देखने का सार्थक प्रयास किया है | अपने आत्म कथ्य को कवि ने '' मैं फिर उगाऊँगा '' सपने नये '' नाम दिया है || सचमुच प्रखर कवि ध्रुव सिंह 'एकलव्य ' साहित्य समाज में सामाजिक चिंतन का एक नया अध्याय लेकर आये हैं , जिनकी धारदार कलम के साथ पैनी अंतर्दृष्टि बहुत प्रभावित करती है | ये भीतर की सुसुप्त संवेदनाओं को जगाने का काम भी करती है और उस अधूरे सामाजिक न्याय पर भी ऊँगली उठाती है, जिसमें समाज का शोषित तबका बस शोषित ही बनके रह गया है | बहुमंजिला इमारतों को गगनचुम्बी बनाने का कवायद में उम्र भर मेहनत करते' बुधिया ' सरीखे पात्रों को कभी अपनी एक छत नसीब नहीं होती -- ये क्या विडम्बना नहीं है ? रचनाओं को बड़ी सरल भाषा में बड़ी सतर्कता से लिखा गया है | पाठक की संवेदनाएं बड़ी आसानी से इन रचनाओं के पात्रों से जुड़ जाती हैं | काव्य - संग्रह में उर्दू , हिन्दी के शब्द विशुद्धतम रूप में नज़र आये हैं ,जिसके लिए कवि ध्रुव अत्यंत सराहना के पात्र हैं | नए कवि के रूप में ध्रुव सिंह जी के प्रथम काव्य - संग्रह '' चीख़ती-- आवाज़ें '' का हार्दिक स्वागत किया जाना चाहिए | उनका साहित्यानुराग अनुकरणीय है | अपनी आजीविका के साथ - साथ साहित्योपार्जन सरल कार्य नहीं | ना जाने कितनी लगन और समर्पण से ये शब्द संपदा अर्जित होती है ! उनकी इस अप्रितम उपलब्धि पर मेरी तरफ से उन्हें सस्नेह हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | माँ सरस्वती उन्हें साहित्य पथ पर चलने की अदम्य शक्ति प्रदान करती रहे | साहित्य प्रेमी पाठकों और रचनाकार सहयोगियों से - पाठकों से विनम्र आग्रह है ,कि जिन सहयोगियों की पुस्तकें प्रकाशित हों, उन्हें उनकी पुस्तक खरीदकर प्रोत्साहित करें | | इस तरह रचनाकार को स्नेह के रूप अतुलनीय प्रोत्साहन दें और पुस्तकों के अस्तित्व को बचाने में सहयोग करें | आज माना पुस्तक पढने के लिए पर्याप्त समय नहीं पर कल जरुर होगा | और वैसे भी सस्ती से सस्ती चीजों से सस्ती हैं हिन्दी की पुस्तकें | साभार |
जनवरी 1996 की बात है |कडकडाती ठंड में उस दिन बहुत जल्दी धुंध बरसने लगी थी और चारों तरफ वातावरण धुंधला जाने से थोड़ी सी दूर के बाद कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता था | इसी बीच हमारे दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी तो देखा एकअत्यंत बूढ़े बाबा खड़े थे जिनकी पीठ पर एक गट्ठर लदा था | बाबा ठंड से ठिठुरते हुए मानों पीले पड़ चुके थे और उनके मुंह से कोई बात नहीं निकल पा रही थी | यद्यपि उनके शरीर पर ठण्ड के मौसम के लिए पर्याप्त कपड़े थे | वे पैरों में बहुत ही घिसी सी चप्पल पहने थे | उन्होंने चाय पीने की इच्छा जाहिर की , जिसे वे बड़ी मुश्किल से कह पाए | मेरे पिताजी उस समय घर पर ही थे | उन्होंने बाबा को घर के अंदर बुलाकर , बरामदे में पडी खाट पर बिठायाऔर उनके लिए सेकने के लिए आग मंगवाई | आग सेकने और गर्म चाय पीने के बाद उनकी ठण्ड थोड़ी उतरी और वे आसानी से बोल कर बता पाए कि उनका नाम हाज़ी अली है और वे एक कश्मीरी शाल विक्रेता हैं |अपने अन्य शाल विक्रेता साथियों से अनजाने में बिछुड़ कर रास्ता भूल गये हैं | उन्होंने पिताजी से निवेदन किया कि वे उन्हें ऐसी किसी धर्मशाला इत्यादि का रास्ता बता दें जहाँ वे रात गुजार सकें ,क्योंकि इस समय तक उनके साथी तो स्थान पंचकूला लौट चुके होते थे , जहाँ से वे रोज शाल बेचने के लिए बस द्वारा आते थे | मेरे पिताजी ने उन्हें हमारी बैठक जो कि हमारे घर से थोड़ी ही दूर है - में रात गुजारने की बात कही , जिसे बाबा ने सहर्ष मान लिया | उसके बाद पिताजी बाबा को लेकर लेकर बैठक में चले गये और उनके लिए बिस्तर की व्यवस्था की |हमें उनका रात का भोजन बैठक में ही पंहुचने के लिए कहा |भोजन करवाने के बाद पिताजी ने बाबा को आराम से सो जाने के लिए कहा | उन्होंने बाबा की शालों का गट्ठर कमरे में बनी अलमारी में रख दिया | पिताजी ने देखा बाबा रात को आराम से सो नही पा रहे हैं और लिहाज़वश कुछ कह भी नही पा रहे | पिताजी उनकी आशंका समझ गये और उन्होंने बाबा का गट्ठर उनके पास उनकी खाट पर रख दिया जिसके बाद ही वे चैन की नींद सो पाए | सुबह उठकर पिताजी ने उनके लिए चाय- नाश्ता आदि पहुँचाने के लिए मुझे कहा तो मैं बैठक में बाबा के लिए नाश्ता लेकर गई | मैंने देखा बाबा इत्मिनान से बैठे थे और मेरे पिताजी को बहुत कृतज्ञतापूर्वक धन्यवाद दे रहे थे | उन्होंने हमें बताया कि कई साल पहले उन्हें एक राज्य विशेष में इसी तरह रास्ता भूल कर किसी के घर ठहरना पड़ गया |घर के मालिकों ने इसी तरह उनके गट्ठर को अलमारी में रख दिया और सुबह जब गट्ठर उन्होंने देखा तो इसमें से चार -पांच शाल गायब थी | उस दिन के बाद वे किसी के घर नहीं ठहरे और ना ही उस राज्य के लोगों का विश्वास किया | मेरे पिताजी को उन्होंने बहुत दुआएं दी | मुझे भी बहुत स्नेह भाव से आशीर्वाद दिया और बोले कि जब तुम्हारी शादी हो जाए तो कश्मीर आना तुम्हे बोरी भर अखरोट दूंगा | उन्होंने पिताजी को एक कागज़ के पुर्जे पर अपना पता लिख कर दिया और कहा कि वे कश्मीर आयें और उन्हें भी मेज़बानी का मौक़ा दें | थोड़ा दिन चढ़ जाने के बाद पिताजी ने मेरे छोटे भाई को साईकिल पर बाबा को बस स्टैंड पर छोड़ने भेजा जहाँ पंचकूला से उनके साथियों का दल बस से नौ बजे पंहुचने वाला था | बाबा हमारे राज्य और पिताजीको को सराहते हुए बड़ी सी मुस्कान के साथ रुखसत हो गये | मेरे पिताजी जब तक रहे वे कहते थे वो बाबा कोई दरवेश थे जो उन्हें दुआ देकर चले गये क्योकि फरवरी में ही पिताजी को हार्ट अटैक आया और वे बाल -बाल बच गये | चित्र -- गूगल से साभार -- ============================== =============