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बुधवार, 11 जनवरी 2023

पुस्तक समीक्षा -- कासे कहूँ

 सुरेन्द्रनगर गुजरात से प्रकाशित होने वाली प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका 

 'विश्वगाथा' मेँ,'कासे कहुँ 'पर लिखी मेरी समीक्षा को स्थान देने के लिए पत्रिका के सम्पादक आदरनीय पंकज त्रिवेदी जी का हार्दिक आभार 🙏🙏



 



कविता  जीवन का  ऐसा राग है जिसकी  सम्पूर्ण परिभाषा  साहित्य के  पुरोधा  अपने भरसक प्रयास के बावजूद तय नहीं कर पाए | पर एक सत्य है,  जो सर्वमत से  स्वीकार्य  है --  चाहे  सृष्टि में  शब्द नहीं थे , लेखनी नहीं थी ,  कविता प्रत्येक युग में अपनी विलक्षणता के साथ उपस्थित रही है | कविता बहती रही है भीतर ही भीतर किसी अतःसलिला-सी , निशब्द और निस्पंद!पर जब इसे शब्द मिले ये निर्झर-सी  अविराम बह चली --- कभी गीत बनकर , कभी छंद बनकर और कभी स्वछन्द हो  हुलसती  , किलकती रही | आखिर कविता कब जन्मती है ?जब भीतर की संवेदनाएँ   स्वयंम से संवाद करती हैं,  तो ये संवाद एक कविता  का मूर्त  रूप  धारण कर आता है  | जीवन की विसंगतियों , विद्रूपताओं  के साथ  अन्य मानवीय  भावनाओं को मुखर करती कविता मानवता को पोषित और पल्लवित करती हुई समय की सबसे बड़ी साक्षी बनकर  खड़ी रहती है |यह कविता ही है जो अदम्य साहस से जीवन की सच्चाई को समस्त विश्व के सामने रखने का ज़ोखिम उठाती है |   हिंदी ब्लॉगर और  कवि विश्वमोहन जी का नवीन काव्य-संग्रह भी  कवि मन की सूक्ष्म संवेदनाओं  का     महत्वपूर्ण  दस्तावेज है -------जहाँ  कवि-- कासे कहूँ? प्रश्न से दोचार  और बेज़ार  है | खुद से  प्रश्नों का प्रतिउत्तर   हैं---  कासे  कहूँ की  इकावन   रचनाएँ  ---- जिनकी विषय-वस्तु पाठक को  देश , समाज  और  प्रेम के विभिन्न आयामों से रूबरू कराती है | कवि के पास  गाँव-गली की यादें भी हैं,तो पीड़ित  मानवता  के लिए गहरी  करुणा भी | अनैतिक और आराजक तत्वों के लिए क्षोभ के साथ उन्हें लानत  भेजने का दुस्साहस भी | काव्य-संग्रह  की शुरुआत   होती है प्रेम कविताओं  से जिनमें में आरम्भ में ही 'अर्पण 'नाम से  प्रेमासिक्त  ह्रदय का एक विशेष आह्वान है जिसमें व्याप्त माधुर्य अनायास  मन को बाँध लेता है -- 

संग-संग रंग मेरे मन का,/तनिक -सा तुम भी भर लो ना//

भले ' भले' हो तुम तनहा में,/यादों में निमिष ठहर लो ना// 

इसके बाद काव्य-संग्रह की प्रथम कविता  प्रणयोन्मत ह्रदय के उदगार  के रूप में पाठकों को  प्रेम के अछूते  रूप से अवगत कराती है , जिसमें प्रेयसी के प्रति   प्रगाढ़ आत्मीयता से परिपूर्ण एक गहन सांत्वना है  और  विरह- विगलित  मन - प्रान्तर को सहलाने की प्रबल आंकाक्षा  भी | प्रणयी-पुरुष,  मानो शिव बनकर  प्रेयसी की समस्त वेदना का गरल गटकने को   आतुर है | जिसे  अत्यन्त मोहक शब्दों  बाँधा है  कवि ने --

 दुःख की कजरी बदरी करती , /मन अम्बर को काला . /क्रूर काल ने मन में तेरे , /गरल पीर का डाला . /

ढलका सजनी, ले प्याला , /वो  तिक्त हलाहल हाला// 

मुख शुद्धि करूँ-/तप्त तरल गटक गला नहलाऊँ / पीकर सारा दर्द तुम्हारा / नीलकंठ बन जाऊँ///

 एक पुरुष होते हुए भी  कवि ने नारी के एक आम उपालम्भ' तुम क्या जानो - पुरुष जो ठहरे -' को लेकर एक कालजयी रचना की सृष्टि की है --

मीत मिले न मन के मानिक/ सपने  आँसूं में बह जाते हैं। /

जीवन के  वीरानेपन में,/महल ख्वाब के  ढ़ह जाते हैं।/

टीस-टीस कर दिल तपता है/भाव बने घाव ,मन में गहरे।//

तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!/////

तो वहीँ प्रेम की ये अदा भी कहाँ आम है ?----------------

 प्रणय विजय में तुम्हारी//प्रीत का पय पान कर//प्रेम तरल अधर रस से/अमर जल को छानकर//

घोल हिय के पीव अपना/पान करता थारकर//तू हार जाती जीतकर/मैं जीत जाता हारकर!//

तो  वहीँ  रचना 'एकोअहंद्वितीयोनास्ति!' दो आत्माओं  के  एकाकार होने की प्रबल  कामना को संजोती है  तो  सृष्टि के उद्धारक   युगल के  अस्तित्व की अभिन्नता '  नर - नारी ' में दिखाई पड़ती है ||

प्रकृति और पुरुष की   सम्पूर्णता को दर्शाती हैं प्रेम -आधारित  दूसरी रचनाएँ , जिनमें प्रेम के संयोग और वियोग दोनों पक्षों को बड़ी ही सुघढ़ता से  अभिव्यक्त  किया गया है | रचना 'कासे कहूँ  हिया  की बात '--  गाँव की गोरी के अंतर्मन की अनकही पीड़ा को बड़ी ही मार्मिकता के साथ  व्यक्त  करती है ,  जहाँ विरही नायिका की निष्फल  होती प्रतीक्षा और मन  की  अनाप - शनाप शंकाओं को बड़ी ही खूबसूरती से शब्दों में  पिरोया  गया है --

पसीजे नहीं, पिया परदेसिया,/ना चिठिया, कोउ बात।

जोहत बाट, बैरन भई निंदिया,/रैन लगाये घात। //कासे कहूँ हिया की बात !

तो 'जुल्मी  फागुन पिया ना आयो'---- नारी मन की अव्यक्त व्यथा -कथा और अंतस का अनकहा प्रलाप है ।  जहाँ पीड़ा के   साथ बतरसिया निर्मोही साजन के प्रति अखंड प्रेम और विश्वास का उद्घोष। भी किया गया  है |----

बरसाने मुरझाई राधा /कान्हा, गोपी-कुटिल फंसायो//

मोर पिया निरदोस हयो जी//  फगुआ मन भरमायो//जुलमी फागुन! पिया न आयो!

    ढ़लते  सूरज के साथ  सजी सिन्दूरी संध्या  के प्राकृतिक सौन्दर्य     को उकेरता  मोहक  शब्द- चित्र  'दो पथिककिनारे '   कवि के भीतर के अनन्य  प्रकृति- प्रेम का परिचय  देता है  जहाँ  प्रेम को पुरुष और प्रकृति के साँझे उद्यम की  संज्ञा दी गयी है  -

पुरुष-प्रकृति प्रीत परायण,/प्रवृत्त नर, निवृत्त नारायण।//मिलन-चिरंतन का मन, मंगल-गीत उचारे,

राही राह निहारे /दो पथिक किनारे ! 

 अपनी दैहिक विसंगतियों को दरकिनार कर , सुघड़ आर्थिक प्रबंधन के साथ बच्चों की तरक्की की निस्वार्थ आकांक्षा संजोये   संघर्षशील आम पिता  का  'बाबूजी'  नामक    रचना   में  मार्मिक चित्रण  किया  गया है   जिन्होंने कम साधनों में भी ,अपनी संतान को सफलता के शिखर तक पहुँचाने के लिए , तन और मन से अपना अतुलनीय योगदान दिया है |---

कफ, ताला, बलगम, जेब, अँगोछा/पेटी, ,जनेऊ, चाभी, मोतियाबिन्द

मिरजई, बिरहे की तान- सब संजोते //बाबूजी आँखों में, रोशन अरमान/बच्चों के बनने का सपना!//

 तो  वहीँ बेटी की विदाई पर  आकुल -व्याकुल  पिता के ह्रदय की वेदना  मन को  भीतर तक छू जाती है --

बेटी विदा, विरह वेला में /मूक पिता ! क्या बोले?//लोचन लोर , हिया हर्षित/आशीष की गठरी खोले.

अंजन-रंजित,कलपे कपोल/कंगना,बिन्दी और गहना,//रोये सुबके सखी सलेहर /बहे बिरह में बहना.//

पुस्तक में  प्रेम और परिवार के साथ   साथ  समाज की  विसंगतियाँ भी  कवि की सूक्ष्म दृष्टि से छुप नहीं पायी है  राष्ट्र और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार से व्यथित कविमन   चिरनिद्रा में लीन बापू  को भी  उलाहना देने से नहीं  चूकता -- |-----

उठ न बापू! जमुना तट पर,क्या करता रखवाली ?/तरणि तनुजा काल कालिंदी,बन गयी काली नाली।

राजघाट पर राज शयन! ये अदा न बिलकुल भाती।//तेरे मज़ार से राज पाठ,की मीठी बदबू आती।

तो दुष्कर्मी नर को नपुंसक कहने में  कवि  को कोई गुरेज नहीं --

  हबस सभा ये हस्तिनापुर में //निरवस्त्र फिर हुई नारी है//

अन्धा राजा, नर नपुंसक//निरलज ढीठ रीत जारी है !

सम-सामयिक  घटनाओं पर पैनी दृष्टि के साथ कलम का  तीखा वार सोचने पर मजबूर करता है | नोटबंदी   प्रकरण पर लिखी 'नोटबंदी ,'  पुलिस और  कानूनविदों की मिलीभगत पर  करारा व्यंग ' खाकी - कलुआ भाई भाई '  बच्चों की मौत पर राजनीति की रोटियाँ सकती सियासत पर  'कुटिल कौन कैसी  फ़ितरत,' शीना हत्याकांड पर 'रिश्तों की बदबू ', डेंगू  की विपदा के बीच  ईश्वरतुल्य माने जाने वाले चिकित्सकों के व्यावसायिक रवैये पर -''प्लेटलेट्स की पतवार फँसी 'डेंगी'में।', कथित बुद्धिजीवियों का छद्म प्रपंच और व्यर्थ  में ही खुद को  मानवतावादी   दिखाने की चाह  ,'पुरस्कार वापसी,'  भूकम्प की विभीषिका के बाद   अमर आशा पर -'आशा का बीज 'आदि के साथ  फुटपाथ ,'गरीबन के चूल्हा' ,  पानी - पानी/ बैक वाटर/ मंदी , , कालजयी  कवि , सजीव अहंकार  इत्यादि   के साथ  देश की गौरव -- सेना की महिमा को  बढ़ाती रचना ; कदमताल   लाजवाब है |

 पाथर -कंकड़      वन्दे दिवाकर सिरजे संसार , ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय और अघाए परमात्मा इत्यादि  कवितायें कवि की आस्था और आध्यात्मिक  अभिरुचि   का सृजन है |

 इन सबके साथ लोकरंग  को प्रखर कवि ने अपनी आँखों से ओझल नहीं होने दिया है |लोक भाषा  की  गरिमा को अक्षुण रखती भाव-प्रवण रचनाएं कहीं ना कहीं  स्मृतियों में बसे  विस्मृत आँगन की याद दिलाती हैं | भोर -भोरैया में  नारी मन की दारुण दशा  का मार्मिक चित्र --

 भोर भोरैया, रोये रे चिरैया /बीत गयी रैना, आये न सैंया// तो 'मोर अँगनैया' में 

  बावरी बयार बाँचे//आगी लागी बगिया.

जोहे जोहे  बाट जे //बिलम गयी अँखिया .//  अत्यंत मनभावन हैं |

 संक्षेप में,  यदि कहें हर रंग ,हर  विषय की रचना  के रूप में  कवि की असीम प्रतिभा दिखाई  पड़ती  है तो कोई अतिश्योक्ति ना होगी | आज मानो,  जब कविता  में अलंकारों  के प्रयोग  के चलन का लोप-सा ही होता जा रहा  है    इन रचनाओं में रूपक , मानवीकरण  इत्यादि  अंलकारों  के साथ अनुप्रास अंलकार की  टूटती  साँसों में  जीवन भरता उनका प्रयास यत्र-तत्र  कई रचनाओं में  मनमोहक शैली  में  दिखाई पड़ता है | पुस्तक की  सभी रचनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण  करते  कई विद्वान    साहित्य -साधकों   के विचार -- पाठकों को सरस , सहज और  बेबाक समीक्षा  से अवगत कराते  हुए सृजन के महत्वपूर्ण बिन्दुओं से परिचय भी कराते हैं | | पुस्तक का आवरण चित्र अत्यंत मनमोहक और आकर्षक है  जो पुस्तक की विषय-वस्तु  के साथ पूरा न्याय करता है |  परिचय में कुछ  टंकण अशुद्धियाँ , संस्कृतनिष्ठ शब्दावली  और देशज शब्द जरुर पाठकों  के लिए दुरूह साबित हो सकते हैं पर  भाव-प्रवाह    में ऐसी आशंका निर्मूल साबित होने की पूरी संभावना है |निश्चित ही ये पुस्तक पठनीय  और  संग्रहणीय  है |एक अभियन्ता की साहित्यिक  अभिरुचि  का शानदार प्रतीक  है ये काव्य संग्रह |

 अंत में , विश्वमोहन जी को पुस्तक के प्रकाशन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं| पुस्तक  काव्य -रसिकों   के बीच  लोकप्रिय हो और साहित्य जगत की  के रूप में   इसका उच्च  मूल्यांकन हो ,  यही कामना करती हूँ | 

पुस्तक :  कासे  कहूँ ,मूल्य: 150

लेखक : © विश्वमोहन

प्रकाशक :  विश्वगाथा, सुरेन्द्रनगर   ,  गुजरात /-

पुस्तक  अमेजन  पर उपलब्ध है |


 


 


 

 

 

 

शनिवार, 24 सितंबर 2022

आओ देवता आओ !--कहानी

 


रसोई से आती विभिन्न स्वादिष्ट  व्यंजनों  की मनभावन गंध और माँ  की स्नेह भरी आवाज  ने घर से बाहर जाते  नीरज  के कदमों को सहसा रोक लिया |'' आज तुम्हारे दादा जी 'पहला' श्राद्ध है बेटा ! इसलिए उन्हें  समर्पित  जो विशेष पूजा होगी  वो तुम्हारे ही हाथों से होगी | तुम जानते हो  तुम्हारे हाथों हुई  पूजा से उनकी आत्मा को  कितनी शांति मिलेगी !'

 वैसे तो श्राद्ध पखवाड़े में  शायद ही कोई दिन जाता होगा जिस दिन  परिवार के किसी ना किसी दिवंगत सदस्य  का श्राद्ध  ना होता हो , पर उनमें से किसी को भी नीरज  ने नहीं देखा था |खीर, पूरी, हलवा और ना जाने क्या -क्या दिवंगत आत्माओं के निमित्त बनाए जाते | इसी तरह आज दादा जी के  श्राद्ध  के लिए वही ख़ास चीजें बन रहीं थी जो उन्हें विशेष तौर पर पसंद थी | बनते पकवानों की खुशबू दूर-दूर  तक फ़ैल रही थी |नीरज को पता था सभी चीजें थोड़ी देर में बनकर तैयार हो जाएँगी | तब पंडित जी आकर पूजा  करवाएँगे |

अभी सब कार्यों में थोड़ी-सी देर थी, इसलिए  वह घर से कुछ कदम दूर बैठक में जाकर बैठ गया | बैठक  के प्रांगण में बरसों पुराना नीम का पेड़ खड़ा था | अब की बार भादों में जमकर बारिश हुई थी अतः नीम पर हरियाली की एक अलग ही छटा छाई थी| हरे- हरे  पत्तों से  लदी उसकी टहनियाँ हवा में धीरे-धीरे लहरा रही थीं |

  नीम को निहारते  दादा जी की याद  आई तो  नीरज का मन अनायास भर आया |और वह नीम के नीचे पड़ी  खाट पर बैठ कर यादों  में डूब गया ------  -------- --------- -------- ----------!

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 जब से नीरज ने होश सम्भाला था ,तबसे दादा जी को अपनी हर ख़ुशी  और परेशानी में अपने साथ खड़े पाया था |दादा जी उसके लिए सिर्फ उसके दादा जी भर नहीं  थे . उसके मार्गदर्शक और दोस्त भी थे |उसकी कोई भी समस्या हो वे उसे चुटकियों में हल कर देते थे |अपने निर्मल स्नेह के साथ   मेहनत , लगन और धैर्य का जो पाठ  दादा जी ने उसे पढ़ाया था , उसने उसके जीवन को बहुत सरल बना दिया था | पढाई के अतिरिक्त समय  में वे उसे अपने साथ रखते और अपने जीवन के अनुभवों  और मधुर यादों को उसके उसके साथ साझा करते |तब उसे लगता वह भी उनके साथ बीते समय में पहुँच गया है | पौराणिक  और ऐतहासिक ज्ञानवर्धन करने में उनका कोई सानी ना था |उन्होंने  लोक जीवन के अनदेखे और अनगिन पहलुओं से उसका परिचय करवाया था |दादा  जी उसे प्रति सुबह जल्दी  नींद से जगाते और   खेतों की सैर पर ले जाते | वे   प्रत्येक मौसम की फसल  और प्रकृति  के बारे में उसे ढेरों  बातें बताते जिन्हें सुनकर  वह रोमांचित  हो जाता और प्रत्येक सुबह की बेसब्री से प्रतीक्षा करता |दादा जी  में  उसने सदैव एक अनोखी ऊर्जा  को  पाया था| वे उसे कर्मठता , सादगी और जनसेवा की भावना से भरे एक अनोखे इंसान लगते जो सदैव हर जरूरतमंद की मदद को तैयार मिलते |सभी पर्वों को मनाने के लिए वे सदैव उत्साहित रहते  और ऐसे अवसरों पर वे  सभी बच्चों के साथ स्वयं भी  बच्चे बन जाते |उसे वह दिन याद आया जब उसने दादा जी को पहली बार  कौओं को  जिमाते देखा था |दादा जी थाली में रखी  खीर  भरी पूरियों के छोटे-छोटे  टुकड़े कर उन्हें छत पर  डालते  हुए , आँगन में खड़े हो कर जोर-जोर से चिल्लाते ,' आओ देवता आओ ----- आओ देवता आओ --'तभी वह देख्ता दर्जन भर  कौओं का झुण्ड ना जाने किस दिशा  से आता   और खीर सनी पूड़ियों के टुकड़े खा कर किस दिशा में उड़ जाता  !नन्हा नीरज बड़ी हैरानी से  दादाजी को तकता रह जाता !वह सोचने लगता  --- कितनी अजीब बात है !-- जब हर रोज यही कौए घर की छत पर बैठकर काँव-काँव करते हैं तो माँ,दादी और चाची सब उन्हें कितनी उपेक्षा से उड़ा दिया करती हैं !उनकी कर्कश काँव-काँव सुनकर  उन्हें डर सताता  है कि  कहीं वक्त-बेवक्त   कोई अनचाहा मेहमान  ना  आ जाए  | ---- और आज इन विशेष दिनों में कौए को देवता बताया जा रहा है !वह मन ही मन हँसा और दादा जी से पूछने लगा ---' दादा जी ! क्या कौए देवता होते हैं ? 

हाँ रे !' दादा जी उसे प्यार से समझाते |'' इन दिनों में   हमारे पूर्वज  इसी रूप में उनके प्रति हमारी श्रद्धा देखने आते हैं |

उसका बाल मन यहीं संतुष्ट ना होता | वह फिर प्रश्न करता -' श्राद्ध क्या होता है दादा जी ? ''

श्रद्धा से अपने पूर्वजों  का स्मरण और उनके निमित्त किया गया कर्म ही श्राद्ध है |'

'पर श्राद्ध क्यों दादा जी ? '' उसकी जिज्ञासा शांत होने का नाम नहीं ले रही थी |

 प्रश्न के बदले दादा जी ने उसी से एक प्रश्न किया --'क्या मेरे दुनिया में से जाने के बाद तुम मुझे याद ना करोगे ? नन्हा नीरज दादा जी के इस प्रश्न को सुनकर बड़ी  गहरी सोच में डूब जाता  , तो दादा जी कहते  -'करोगे ना ?इसी तरह मेरे दादा-दादी , परदादा-परदादी वगैरह ने भी चाहा होगा कि मैं उन्हें कभी ना भूलूँ !इस तरह मैं भी अपने पूर्वजों को श्राद्ध- पखवाड़े  में बड़ी श्रद्धा से याद करते हुए यथाशक्ति उनके निमित्त  श्रद्धा -कर्म  करता हूँ |

वह हैरानी से कहता , 'सच दादा जी!' 

और दादा जी हाँ कहते हुए श्राद्ध की समस्त प्रक्रिया में उसे अपने साथ बिठाते  |उनकी देखादेखी वह  सभी कार्यों में  बड़ी प्रसन्नता और उत्साह से उनका हाथ बँटाता|पर उसने कभी सोचा ना था कि उसके दादा जी  उससे  कभी दूर भी जा सकते हैं |मात्र कुछ दिनों के बुखार ने उन्हें नीरज से हमेशा के लिए दूर कर दिया था |जीवन में किसी महत्वपूर्ण स्थान का अचानक रिक्त हो जाना क्या होता है ये नीरज ने तब जाना जब दादा जी नहीं रहे |  बैठक का  हरेक कोना उससे दादा जी याद दिलाता |हर विषय की किताबों से भरी लकड़ी की अलमारी,कुर्सी,  दादा जी का चश्मा ,पैन और घड़ी नीरज को विकल कर देते |आज उदासी से भरा वह उनकी वही चीजें निहार रहा था | उसे एक बात सबसे ज्यादा दुःख दे रही थी कि  दादा जी ने उसकी मैट्रिक की परीक्षा के लिए साहित्य  और सामाजिक अध्ययन  की जो तैयारी उसे करवाई  थी, उसका  सुखद परिणाम  वे अपने जीते जी देख ना पाए |नीरज मैट्रिक की परीक्षा में मैरिट लिस्ट में स्त्थान पाकर भी उत्साहित ना हुआ | वह यही  बात सोचता रहा कि दादा जी होते तो  खुश  होकर उसे ढेरों आशीर्वाद और शाबासियाँ देकर गले से लगा लेते, तो बधाईयाँ देने वालों को खूब मिठाइयाँ खिलाते |नीरज का मन मानों  बुझ - सा गया था हालाँकि  घर भर के लोग उसकी इस आशातीत सफलता पर बहुत खुश थे, पर नीरज को इस बात का पछ्तावा होता कि  दादा जी  ने अप्रत्याशित रूप से उसका साथ  छोड़ दिया है | वे उसके साथ होते तो भविष्य के लिए उसका खूब मार्गदर्शन करते क्योंकि  वे स्वयं सरकारी स्कूल से सेवानिवृत  अध्यापक थे | बच्चों के बीच उन्होंने सालों बिताए थे और  बालमनोविज्ञान  से   भली- भाँति  वाक़िफ थे |सभी बच्चों के मन की बात वे बिना बताये समझ जाते थे |

बचपन में नीरज दादा जी को  खूब  सताता | रंगीन फोटो  बार-बार देखने की जिद में वह किताबों की अलमारी खोलकर सब किताबें इधर-उधर बिखेर  देता | उनका चश्मा लेकर भाग जाता तो कभी उनकी पीठ पर  चढ़कर हठ करता  कि वह उसे घर तक तत्काल छोड़कर आयें |दादा जी उसकी बालसुलभ शरारतों पर उसे   डाँटते ना फटकारते | हाँ , उसे हँसकर ये  अवश्य कहते ,''कि तुम्हारी शरारतों का बदला मैं तुमसे इसी घर में दुबारा जन्म लेकर लूंगा और तुम्हें खूब सताऊँगा|'

''लेकिन कैसे दादा जी ? वह उत्सुकतावश पूछ बैठता |

 वे तब थोड़ा गंभीर होकर कहते ,' मैं हमेशा  तुम्हारे पास  थोड़े ना रह पाऊँगा | एक ना एक दिन  मुझे भगवान् जी के पास जाना ही पडेगा |उसके बाद मैं किसी और रूप में तुम्हारे पास आ जाऊँगा !'' वे उसका  सर सहलाते हुए कहते | 

'नहीं दादा जी ''-- नीरज सब शरारते भूलकर उनसे  लिपट जाता और कहता --' मैं आपको भगवान् जी के पास कभी ना जाने दूँगा| आप हमेशा रहेंगे मेरे साथ |'

नीरज तब लगभग रो  पड़ता तो दादा जी उसे गले से लगा कर खूब समझाते हुए नीम का पेड़ दिखाते और कहते --'देखो! ये नीम का पेड़ है ना !बारिश में जब इसकी निबौरियाँ झरती हैं तो ढेरों नन्हें पेड़ उगते हैं |ये पेड़ अपने ना होने के बाद भी इन नन्हें पेड़ों   में हमेशा  जीवित रहता है |वैसे ही इंसान भी संसार के जाने के बाद भी   अपने बच्चों और नाती- पोतों में हमेशा  रहता है |नीरज की आँखें नम हो आईं|

 तभी  उसकी तन्द्रा भंग हुई | उसने देखा मँझले चाचा जी  उसे  बुला रहे थे |पूजा की तैयारी पूरी हो चुकी थी थी |पंडित जी भी पधार चुके थे |  पहली बार नीरज ने अपने  पूरे  परिवार को बड़े ध्यान से देखा तो   अपने पिताजी आज उसे दादा जी की तरह नज़र आ रहे थे -- उन्हीं की तरह बिलकुल गंभीर और दायित्व से भरे हुए !मँझले चाचा की    मूँछें दादा जी तरह ही नुकीली थी , तो छोटे चाचा  मोटी-मोटी आँखों  और  हँसते हुए चेहरे के साथ दूसरे दादा जी ही लग रहे थे | जड़वत-सा खड़ा  वह सोच रहा था कि अब तक वह ये सब क्यों जान ना पाया था |सचमुच , नीम के नन्हे पौधों की तरह दादा जी घर के हर सदस्य में नज़र आ रहे थे |

इसी बीच पंडित जी ने पूजा की और खीर व पूरियों से भरी थाली कौओं को जिमाने के लिए नीरज के हाथ में दे दी |नीरज ने पूरियों के छोटे- छोटे टुकड़े किये और आँगन में खड़े होकर  कौओं के लिए छत पर  डाल दिया | साथ में जोर-जोर से आवाज़ लगाई ,' आओ देवता आओ !आओ देवता आओ !' कौओं के झुण्ड छत पर उतरने लगे थे |नीरज को अपने भीतर दादा जी मुस्कुराते हुए नज़र आ रहे थे | अनायास   आँखों से गर्म आँसूं छलक कर  उसके  गालों  पर लुढ़कने लगे थे | 


शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

पुस्तक समीक्षा और भूमिका --- समय साक्षी रहना तुम


 

 आज मेरे ब्लॉग क्षितिज  की पाँचवी वर्षगाँठ पर मेरे स्नेही पाठक वृन्द    को सादर आभार और नमन | शब्दों  की ये पूँजी आप सबके  बिना  संभव ना थी | हालाँकि पिछले वर्ष  लेखन में अपरिहार्य  कारणों से कई  बाधाएँ आईं पर   इस वर्ष  ये  सुचारू    रूप  से होने  की आशा है |इस वर्ष मेरे पहले काव्य-संग्रह का आना मेरे लिए बड़ी  उपलब्धि रही | पिछले दिनों  इस पुस्तक  की समीक्षा मिर्ज़ापुर उत्तर प्रदेश  के  वरिष्ठ साहित्यकार  आदरणीय भोलानाथ जी कुशवाहा ने लिखी |जिसके लिए उनके लिये आभार के शब्द नहीं हैं मेरे पास |  उन्होंने अपने खराब  स्वास्थ्य के चलते भी पुस्तक को बड़े मनोयोग से पढ़ा और अपने विचार समीक्षा के रूप में लिखे | इस समीक्षा को  मिर्ज़ापुर के कई समाचार पत्रों में स्थान मिला |आदरणीय   भोलानाथ  जी को कोटि आभार  के साथ उनकी लिखी समीक्षा आज यहाँ   डाल रही हूँ | इसी के साथ  मेरे अत्यंत  स्नेही भाई   शशि गुप्ता  जी को कैसे भूल  सकती हूँ जिन्होंने पुस्तक की कई प्रतियाँ  मँगवाकर इन्हें    भोलानाथ जी और कई  अन्य साहित्यकारों तक  पहुँचाया | आपका हार्दिक आभार शशि भैया  | पुस्तक में आपके  अनमोल  मार्गदर्शन के साथ त्रुटी सुधार में आपकी भूमिका   अविस्मरणीय है | 




समय साक्षी रहना तुम/कविता संग्रह/  कवयित्री रेणु बाला

भूमिका

                                          विवेक के वितान पर तने विचार अक्सर सूखे और ठूँठ होते हैं। इसकी प्रकृति विश्लेषणात्मक होती है । ये तत्वों को अपने अवयवी तन्तुओं में तोड़कर अनुसंधान का उपक्रम रचते हैं । इसमें बुद्धि की पैठ अंदर तक होती है। मन बस ऊपर-ऊपर तैरता रहता है। यात्रा के पूर्व का इनका अमूर्त गंतव्य,  यात्रा की पूर्णाहूति के पश्चात मूर्त हो जाता है। यहाँ बुद्धि अहंकार से आविष्ट रहती है। अराजकता का शोर-गुल भी बना रहता है। परम चेतना के स्तर पर मन, बुद्धि और अहंकार एकाकार होकर आत्म-भाव में सन्निविष्ट हो जाते हैं। आत्मा की  कुक्षी में अंकुरित ये भावनाएँ हरित और आर्द्र होती हैं। यह मनुष्य को जीवन की अतल गहराइयों  तक ले जाती है । इसका स्वभाव संश्लेषणात्मक होता है। यह अपने इर्द-गिर्द के तत्वों को अपने में सहेजती  हैं । इसमें गंतव्य रहता तो हमेशा अछूता है, किंतु उसको छूने का उछाह अक्षय  बना रहता है । गंतव्य का स्वरूप अपनी शाश्वतता में तो सर्वदा अमूर्त रहता है, किंतु उसको पाने की उत्कंठा में वह सर्वदा मूर्त रूप में आँखों के आगे झिलमिल करता रहता है। जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, यह उत्कंठा तीव्र से तीव्रतर होती जाती है: “ज्यों-ज्यों डूबे श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जल होय”। यात्राओं का उत्स तो अनवरत और अनहद होता रहता है, अंत कभी नहीं होता । अतृप्तता का भाव सदा बना रहता है। यह ऊपर से सागर की लहरों के समान तरंगायित तो दिखती है, किंतु इसके अंतस का आंदोलन अत्यंत प्रशांत और गम्भीर होता है । यहाँ अहंकार के लिए कोई अवकाश नहीं ! अंदर के आत्म के सूक्ष्म का विस्तार कब बाहर के अनंत परमात्म में हो जाय और बाहर का अनंत कब  सिमट कर अंदर का सूक्ष्म बन दिल की धड़कनों में गूँजने लगे, कुछ पता ही  नहीं चलता! ‘अयं निज:, परो वेत्ति’ जैसे क्षुद्र भावों का लोप हो जाता है । मन सर्वात्म हो जाता है। भावनाओं की यही तरलता जब अंतस से नि:सृत होकर समस्त दिग्दिगन्त को अपनी आर्द्रता से सराबोर करने लगती है, तो कविता का जन्म होता है। इसी कालातीत सत्य का प्रकट रूप है, साहित्यकार और ब्लॉगर रेणु रचित कविता संग्रह -‘समय साक्षी रहना तुम’ । ।कहावत है, ‘सौ  चोट सुनार की  और एक चोट लोहार की ’। सदियों की सामाजिक क्रांतियाँ नारी-सशक्तिकरण की दिशा में अपनी  सौ चोटों  का वह  प्रहार प्रखर नहीं कर पायीं, जो सूचना-क्रांति ने अपनी एक चोट में कर दिया । सोशल मीडिया और ब्लॉग की धमक ने साहित्य-जगत को भी अंदर तक हिला रखा है । तथाकथित प्रबुद्ध साहित्यिकारों  के अभिजात्य वर्ग पर सृजन की अद्भुत क्षमता से युक्त,  सारस्वत स्त्रियों ने अपनी रचनाशीलता के पाँचजन्य-नाद से अब धावा बोल दिया है । रसोईघर में रोटियाँ पलटने वाली गृहिणियाँ,  रचनाशीलता के संस्कार में सजकर अपनी लेखनी से अब पौरुष की दम्भी सामाजिक अवधारणाओं को उलटने लगी हैं । वे अपने विस्तृत अनुभव संसार को अपनी लेखनी में प्रवाहित करने लगी हैं और उनकी यह सृजन-धारा अनायास  इंटरनेट के माध्यम से समाज के एक विपुल पाठक वर्ग को भिगोने भी लगी है । स्वभावत: भी,  नारी ममता की  मंजूषा, वात्सल्य की वाटिका और करुणा का क्रोड़ होती है ।  उसकी  अभिव्यंजना  की धारा का साहित्यिक मूल्यों के धरातल पर प्रवाहित होना ठीक वैसा ही है, जैसा कि मछली का जल में तैरना । ‘समय साक्षी रहना तुम ’ कविता-संग्रह इस तथ्य का अकाट्य साक्षी है।‘अंबितमे नदीतमे देवितमे  सरस्वती,  अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि’  की ऋचाओं से  गुँजायमान ऋग्वेद की रचना की भूमि  हरियाणा से सरस्वती-सुता साहित्यकार  रेणु की कविताओं का यह पहला संग्रह साहित्य के आकाश में एक बवंडर बनकर चतुर्दिश आच्छादित होने की क्षमता से परिपूर्ण है । वंदना के विविध स्वरूपों से लेकर रिश्तों की ऊष्मा, खेत-खलिहान, गाँव-गँवई, चीरई-चिरगुन, गाछ-वृक्ष, सामाजिक संस्कार, माटी की सुगंध, चौक-चौबारों पर बीते बचपन की अनमोल यादें, मानवीय संबंधों की संवेदनाओं का सरगम, पिता का स्नेह, माँ की ममता, बेटी का प्यार और राष्ट्र-प्रेम का ज्वार – इन समस्त आयामों को अपनी अभिव्यंजना का स्वर देती कविताओं का यह संकलन, कवयित्री की रचनाशीलता के विलक्षण संस्कार का साक्षात्कार है। संग्रह के प्रेमगीत परमात्मिक चैतन्य की पराकाष्ठा पर प्रतिष्ठित हैं। अभिसार की रुहानी सुरभि की प्रवाह-तरंगों पर आध्यात्मिकता का अनहद-नाद संचरित हो रहा है, जहाँ मानो अनुरक्त हृदय की भावनाओं का उच्छ्वास एक परम-विलय की स्थिति में थम-सा गया हो और उसमें प्रेयसी और प्रियतम  के प्रेरक, कुंभक और रेचक एक साथ विलीन होकर महासमाधि की स्थिति को प्राप्त हो गए हों ।शब्दों की बुनावट के साथ-साथ कहन की कसावट और शिल्प अत्यंत सहज, सुबोध और मोहक हैं, जो प्रीति की अभिव्यक्ति को अपने निश्छलतम स्वरूप में परोसते हैं ।सारत: अब बस इतना ही कि “हे समय! साक्षी रहना--- ‘समय साक्षी रहना तुम ’का !”                                                             


                                                            विश्वमोहन

                                                  सुप्रसिद्ध ब्लॉगर और   साहित्यकार  


शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

एक बलिदानी का अस्थि विसर्जन ---- संस्मरण

युद्ध अथवा  शांतिकाल  में सैनिकों की शहादत कोई  नई  बात  नहीं। ये शहादत  आमजनों  के लिए मात्र एक  खबर  होती  है  , पर  उसके  परिजनों  के  लिए  असहनीय  आघात। हम अकसर  उस  पीड़ा से  अनभिज्ञ  रहते  हैं, जो उनका  परिवार  झेलता  है। कुछ  वर्ष पहले   एक ऐसे परिवार  का  दर्द   मैनें बहुत  नजदीक  से  देखा जिसे  मैं कभी   भूल  नहीं पाई।------------ 

बात शायद मई  2011 की है | मुझे मेरे  भतीजे के मुंडन संस्कार में ज्वाला जी जिला कांगड़ा  हिमाचल प्रदेश जाने का मौक़ा मिला |   मेरे मायके में ज्वाला  जी के प्रांगण में ही मुंडन की परम्परा है |  मेरे भाई ने  मुझे भी अपने  बेटे  के  मुंडन  के  लिए,सपरिवार अपने साथ जाने के लिए बुलाया था |  मेरे गाँव से ज्वालाजी   मदिर की दूरी लगभग छः घंटे  की है | चण्डीगढ़ से  राष्ट्रीय सड़क मार्ग से होते हुए  हमें  ज्वालाजी  जाना था  | लम्बी  दूरी  को देखते हुए  , इस रास्ते  पर स्थित गुरुद्वारों में थोड़ा विश्राम  करने की  बात तय हुई|  जाते हुए गुरुद्वारा  आनन्दपुर साहिब पर विश्राम किया गया, तो लौटते   समय,  गुरुद्वारा पतालपुरी  कीरतपुर साहिब पर  कुछ देर रुकने का निर्णय हुआ | इस गुरुद्वारे का  सिख धर्म में   ऐतहासिक महत्त्व है | इसकी स्थापना गुरु हरगोविंद जी ने की थी | कहा जाता है सिख धर्म के पांच गुरुओं के पवित्र चरण इस धरा पर पड़े थे और दिल्ली में  गुरु तेग बहादुर जी  की शहादत के बाद उनका सर  इसी स्थान पर माता गुजरी ने   अपने  आँचल में डलवाया  था  | गुरु साहिबान ने इसी जगह को   धर्म में मोक्ष  का स्थान   पुकारते हुए  समस्त   सिक्ख धर्म अनुयायियों   को अपने दिवंगत प्रियजनों की अस्थियों का  विसर्जन    यहीं  करने का  आदेश दिया था  | उस दिन .  क्योंकि  हमारे साथ कई छोटे बच्चे भी थे सो लम्बे सफर  के बीच  ये विश्राम जरूरी था | गुरुद्वारा साहेब    पहुँचकर सभी ने  थोड़ा आराम    किया और जिन्हें भोजन की इच्छा थी उन्होंने लंगर भी  ग्रहण किया |मेरे दोनों बच्चे भी मेरे साथ थे ,जोउस समय बहुत छोटे थे | बिटिया तो  9 साल की ही थी | उसने गुरुद्वारा पहुँचते ही  मुझे आसपास घुमाने की जिद की | मैं उसकी ऊँगली पकड़कर उसे- गुरूद्वारे के एक ओर   बने पवित्र सरोवर  के पास ले गयी  जहाँ   ढेरों   श्रद्धालु स्नान कर रहे थे | हम दोनों दूर  खड़े होकर  सरोवर को निहारने लगे | इसी बीच मुझे     कुछ  लोगों  के  जोर से रोने की आवाज सुनाई पडी | जिस ओर से आवाजें  आ  रही थी, उस  तरफ सतलुज नहर गुरुद्वारे  को छूती हुई बह रही थी । 

 और   उसी   ओर वह स्थान  भी था जहाँ  अस्थि विसर्जन स्थल था  | मैंने उत्सुकतावश थोड़ा आगे जाकर देखा वहां   बड़ा करुण- क्रंदन गूंज रहा था | कई लोग अपने प्रियजनों की अस्थियाँ   बहाते हुए  बहुत भावुक हो रो रहे थे |  कुछ धीरे -धीरे सिसक रहे तो  एक दो बहुत ज्यादा  रो रहे थे | इन्हीं में एक वृद्ध दम्पति भी थे जो अपने कुछ ही दिन पूर्व  राजस्थान में  आतंकवादी     मुठभेड़      में     शहीद हुए   बेटे , जो कि  सीमा सुरक्षा बल  में कमाडेंट थे , की अस्थियाँ प्रवाहित करने आये थे | शहीद की पत्नी उन दिनों गम्भीर रूप से बीमार थी  |   वो अपने पति की मौत की खबर सह ना पाई और सदमे से उनकी भी मौत हो गई | इस दम्पति के साथ  शहीद सैनिक के दो  बहुत छोटे अत्यंत दर्शनीय   बच्चे  भी थे. जिनमें लड़के की उम्र  लगभग सात साल थी तो लड़की  मात्र पांच साल की मुश्किल  से थी |  दोनों बच्चे इस  चीत्कार से बहुत सहमे हुए थे  और   निःशब्द रह सबकुछ बड़े कौतूहल से देख रहे थे |  उनका मुख मलिन पड़ा हुआ था | वृद्ध दम्पति ये कह सिसकने लगे कि वे इन  अभागे  बच्चों को इस उम्र में कैसे पालेंगे  -जबकि बच्चों के पास सिर्फ माता-  पिता  ही थे  वे भी ईश्वर ने छीन लिए | परिवार में शहीद एकलौते भाई थे | कोई  दूसरी संतान उनके यहाँ ना होने से वे चिंतित थे कि इन बच्चों का पालन- पोषण अब कौन करेगा |
उन्होंनेअपने शहीद बेटे के  बारे में ये भी बताया  कि  तकनीक में स्नातक होने के बाद उनका  चयन  कई लाख के पैकेज   पर पुणे की एक कंपनी में हो चुका था , पर उन्होंने सीमा सुरक्षा बल के जरिये देशसेवा  को अपनाया। इसे बाद वे इन बच्चों को अनाथ कह सिसकने लगे | एक बार तो    उनके रोने से चारों ओर  निस्तब्धता  व्याप्त हो गई पर एक  -दो  समझदार लोगों ने उन्हें आगे बढ़कर धीरज दिया और कहा कि वे  बच्चों  को बदनसीब और  अनाथ ना कहें | वे भाग्यशाली हैं जिनके पास  अत्यंत स्नेही दादा -दादी  जैसा मजबूत सहारा है | एक  अन्य व्यक्ति ने  उन्हें बताया कि  वह भी अपने इकलौते बेटे की अस्थियाँ लेकर आया है जो कुछ दिन पहले सड़क दुर्घटना में  मारा  गया | पर  उनके बेटे की तुलना में शहीद की मौत एक गौरवशाली मौत थी | कुछ लोग शहीद   अमर रहे के नारे भी लगाने लगे और वृद्ध दम्पति को  बहुत प्रकार से सांत्वना देने लगे | सभी ने शहीद  के पराक्रम  की प्रशंसा की और उन्हें श्रद्धा  से नमन कर ,     ऐसे बहादुर सैनिक के माता  पिता होने पर    गर्व जताया | इसी बीच  गुरुद्वारे  के पाठी  भाई भी आकर उन्हें  समझाने लगे | कुछ ही पलों में शोकाकुल  दम्पति काफी हद तक सहज हो गया |  कुछ लोगों ने शहीद के बच्चों को कंधे पर बिठाकर उन्हें  विशेष  स्नेह  जताया | इसी बीच  उनके  अन्य   रिश्तेदार भी पहुँच गये और शहीद के जय -जयकारों के बीच सबने मिलकर शहीद सैनिक और उनकी पत्नी का अस्थि -विसर्जन किया  |गुरुद्वारा प्रांगण  में देश भक्ति  का अद्भुत  दृश्य उपस्थित हो गया | हर कोई  भावुक था और  शहीद सैनिक  की फोटो पर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहा था | 
कुछ देर बाद वे सभी   से घर की  ओर लौट चले  और मुझे भी मेरे भाई ने  बुला लिया | इधर हम सब लोग घर की ओर लौट चले तो शहीद के परिवार     ने  भी  गाडी ,  जिसपर शहीद की अपनी पत्नी के साथ  सुंदर,  सौम्य  फोटो   लगी हुई थी  .  में बैठ अपने घर की   ओर  प्रस्थान किया |  बहुत दिनों तक  शहीद के उस  अस्थिविसर्जन की यादें मन को  उद्वेलित और    दोनों बच्चों की वो मासूम  निगाहें मन को विचलित  करती रही तो   उनके माता - पिता के करुण चीत्कार मेरी स्मृतियों  में गूंजते रहे | 

अंत में हुतात्माओं  को  नमन करते   हुये मेरी कुछ  पंक्तियाँ  ------
तेरी हस्ती  रहे सलामत
कर खुद को कुर्बान चले ,
तुझे दिया वचन   निभा
 तेरे वीर जवान चले !
हम ना रहेंगे और आयेंगे
 लाल तेरे बहुतेरे माँ
पड़ने ना देंगे तम की छाया
नित लायेंगे  नये सवेरे माँ ;
तेरी खुशियाँ कभी ना हो कम
 कर  घर  आँगन  वीरान चले
लिपट तिरंगे में घर आये
 बढ़ा जीवन की शान चले !!!
🙏🙏🙏🙏🙏
समस्त साहित्य प्रेमियों को  स्वतंत्रता  दिवस  की हार्दिक  शुभकामनायें  और  बधाई🙏🙏

बुधवार, 3 जून 2020

पर्यावरण मित्र -साईकिल [ विश्व साईकिल दिवस पर विशेष ]

साइकिल चलाने वाली लड़की चित्र ...

 क्या आपको  बचपन की अपनी  शान की  सवारी  याद है ?  वो सवारी जिसकी पीठ पर सवार हो   सपनों को जैसे पंख से लग जाते थे | वो सवारी जो  आपको लिए बिना किसी व्यवधान के किसी भी गली -मुहल्ले  में बेरोक टोक  प्रवेश  पर  जाती थी  | वो  एक साथी ,  जिस के साथ को   आम परिवारों के सभी बच्चे लालायित रहते थे  और  एक अनार सौ बीमार जैसी भयंकर स्थिति  होते देर नहीं लगती थी  । जो कभी निम्नमध्यवर्गीय परिवारों में   शान की प्रतीक   थी | जी हाँ , वह साईकिल  के अलावा कोई दूसरी चीज हो ही नहीं सकती |बचपन की  यादों में  हर किसी को जो  याद सबसे ज्यादा रोमांचित करती है, वह है साईकिल की सवारी |  वे वही साईकिल है,  जिसका  विज्ञापन रेडियो और  टी. वी. पर सबसे ज्यादा   मनभावन  लगता था |और जो  बच्चा साईकिल पर स्कूल आता था  सहपाठियों की  नजर में कहीं   ना कहीं    बहुत भाग्यशाली  माना जाता था |  वे वही साईकिल थी  जो   आँगन की  शोभा   मानी जाती थी  और जिसके आगे आज की महंगी कार की ख़ुशी भी  फीकी  है  |
गति के रोमांच  में  पिछड़ी  साईकिल --   विगत ढाई - तीन  दशकों  में  आम आदमी की औसत  आय में अभूतपूर्व   उछाल आया है , जिसके चलते  आम घरों में  साईकिल का  स्थान तीव्र गति से भागने वाले दुपहिया वाहनों  मोटरसाईकिल , स्कूटर,   मोपेड  स्कूटी इत्यादि ने ले लिया |  गति के रोमांच ने साईकिल  को   पीछे छोड़ दिया और बचपन के रोमांच की सवारी  के रूप में  तेजी से भागने वाले दुपहिया  वाहन अधिक लोकप्रिय हो गये | कालान्तर में  दुपहिया  से आगे छोटी कारेंऔर उसके  बाद बड़ी कारें  आ  गयीं |बढती सम्पन्नता के बीच     अच्छी आदमनी वाले अभिभावकों ने   अपने नौनिहालों को  साईकिल की जगह   स्कूटर, बाइक इत्यादि की चाबी सौंपने में अधिक गर्व की अनुभूति की | 
   जादू फिर भी रहा बरकरार -- भले  साईकिल  गति के बढ़ते  शौक के बीच कहीं खो सी गयी थी  |इसके   बाद भी  साईकिल ने अपनी  गरिमामयी उपस्थिति    हमेशा बनाये  रखी |  इसके दो पहियों  पर दौडती ख़ुशी को   महसूस करने वाले लोग हर दौर में रहे   जिन्होंने इसका महत्व बनाये रखा |  परिवहन  का ये सस्ता,  सरल साधन   बहुत से लोगों  की दिनचर्या का अभिन्न अंग रहा भले ही उनके पास    अन्य साधनों की कमी ना रही हो |   दूध  , सब्जी , डाक  और  अखबार वितरण करने वाले लोगों के लिए ,  दशकों से साईकिल  ही  एक मात्र सवारी रही | सेहत के शौकीनों ने भी कभी इसे अपने से अलग नहीं किया | खेलों की दुनिया में भी स्थानीय स्तर से लेकर ओलम्पिक  तक सबमें  साईकिल को सदैव महत्त्व  मिला है | विश्व में    चीन के बाद  भारत  में सबसे ज्यादा साइकिल  बनाई  और  प्रयोग  की  गयी। 

  पर्यावरण मित्र   साईकिल --दो शताब्दियों  का  साथ है साईकिल  और मानव का |  इसकी उपयोगिता को  कभी नकारा नहीं गया |   पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए साईकिल     , वाहन का सर्वोत्तम विल्कप है |थोड़ी दूर जाने के लिए अथवा आसपास किसी काम के  लिए  इससे बेहतर कुछ  भी  नहीं |दिन रात धुंआ उगलते वाहनों  की तुलना में साईकिल  प्रकृति   के लिए किसी वरदान से कम नहीं |  जेट युग में इस  सवारी का  महत्व  फिर से  बढ़ने के आसार दिखाई देते हैं   |  पैसों से ख़रीदे गये   तेल की जगह , शारीरिक बल से चलती साईकिल  कम आमदनी   वाले व्यक्ति के बजट में  भी आसानी से समा  जाती है तो प्रकृति को कोई भी नुकसान पहुंचाए बिना  ,  जीवन के कच्चे- पक्के रास्तों पर  अनवरत चलती रहती है |    
 विश्व साईकिल दिवस -- संयुक्त राष्ट्र संघ  ने पर्यावरण के मित्र के रूप में साईकिल की स्वीकार्यता को बढ़ाने के लिए  ,  एक  दिन साईकिल  के  नाम करते हुए ,आधिकारिक रूप से  3 जून 2018 से    विश्व साईकिल मनाने की अनोखी शुरुआत  की | जिसका मकसद  पर्यावरण  को बचाने के साथ -साथ   लोगों  की बिगडती सेहत को संवारने केअलावा साईकिल को वाहन के  सबसे सस्ते  विकल्प   के रूप में प्रचारित करना भी है | 

सर्वांग  व्यायाम है साईकिल  चलाना-- साईकिल चलाना  एक  सर्वोत्तम   व्यायाम  भी  है | वजन घटाने से लेकर   मानसिक   एकाग्रता में इसका योगदान  अतुलनीय है | साईकिल चलाने से पेट की चर्बी घटती है तो  ह्रदय रोग  का खतरा कम होता है  साथ में  शारीरिक मांसपेशियाँ  मजबूत होती हैं |   रोजाना साईकिल चलाने से  शरीर तो पैरों  , टखनों और जोड़ों को मजबूती मिलती है |  

रोचक है साईकिल का इतिहास ----- हर  आविष्कार   मनुष्य की  अन्वेषी और जिज्ञासु  प्रवृति का नतीजा है \ कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है |   यही बात साईकिल  के आविष्कार  पर भी लागू होती है  इसके बारे में बहुत  प्रामाणिक तथ्य शायद आज भी मौजूद नहीं  और किसी एक व्यक्ति को  इसके  आविष्कार का श्रेय देना भी उचित नहीं | पर  हमें ये जरुर मान लेना चाहिए  कि आविष्कार  के   कई चरणों  से गुजरकर  आज की सर्वगुणसंपन्न साईकिल अस्तित्व में आई | 1418 में  हुए पहिये   का आविष्कार  साईकिल की खोज की नींव बना |    ये जानना भी रोचक रहेगा कि  जर्मनी  के एक नागरिक  जिओ  वानी फुंटाना ने चार पहियों वाली साईकिल का आविष्कार किया था  जो समय   के साथ भूली बिसरी  याद बनकर  गया | इसे बाद 
1818में  कार्ल वॉन ड्राइस नामक व्यक्ति ने  एक साइकिल   बनाई, जिसे धक्का मारकर चलाया जाता था  |इसके बाद  मैकमिलन  नाम के व्यक्ति ने   लकड़ी   के   फ्रेम  के साथ इसमें लोहे के  पैडल   के साथ स्टेयरिंग  भी लगाया था  | पर ये साईकिल बहुत वजनी थी |  समय के साथ बदलती  साईकिल   का फ्रेम  बाद में    फ्रेम  मेटल का हो गया  जिसमें रबड़ के टायर  लगाये गये  | ये पहले से बेहतर हो गयी थी | पर इसके पहिये   असमान अर्थात छोटे बड़े  थे,जो चलाने में  ज्यादा सुरक्षित नहीं थी | 1880  जे के  स्टारले ने  रोबर्ट  नामक साईकिल का आविष्कार  किया  जिसके  बाद  से इसके आकार  और डिजाईन  में  निरंतर बदलाव  होते- होते , ये एक सुरक्षित और सुंदर रूप में अस्तित्व में आई | और बहुत जल्दी लोकप्रिय हो हर मन का सपना बन गयी | इसी के स्वरूप में  तकनीकी सुधारों के साथ मोटर साईकिल और मोपेड , स्कूटर  आदि बनाये जाने लगे जो  ईंधन      से चलते थे और अपनी गति  के रोमांच से साईकिल को पीछे कर लोकप्रियता में आगे निकल गये | पर  ये जानना रोचक रहेगा  किराईट बन्धुओं ने विमान के आविष्कार के लिए साईकिल बनाकर और बेचकर धन जुटाया था और उसके  बाद  की  विमान बनाने की समस्त भागदौड़ साईकिल द्वारा ही   की थी ,  जिसके बाद ही वे ऐसा आविष्कार कर पाए  जिसने मानव  गति को पंख देकर , सभ्यता  के इतिहास को बदलकर रख दिया | आज साईकिल अनेक सुधारों और सुविधाओं के साथ अलग अलग  आकारों और   लुभावने स्वरूपों में  हमारे समक्ष है |  बच्चों से लेकर बड़ों और महिलाओं के लिए ख़ास  तरह की सुविधाओं  के साथ विशेष  मॉडल उपलब्ध हैं | 
  फिल्मकारों की रही चहेती -- साईकिल का जादू फ़िल्मी  दुनिया के सर पर भी खूब  चढ़कर  बोला |   देवानद से लेकर आमिर खान  और  रणधीर कपूर,  तो नूतन से लेकर   आलिया भट्ट तक , सबने रजत पट पर साईकिल खूब चलायी | नायक का नायिका से इजहारे मुहब्बत हो या  नायिका  की कालेज जाते समय सहेलियों के साथ मौज मस्ती ,  सब  दृश्यों में    साईकिल   ने अपनी मनभावन    छटा बिखेरी | पुरानी फिल्मों में फूलों की टोकरी  वाली  साईकिल  चलाते  नायक -नायिका की चुहलबाज़ी किसका मन  ना मोह लेगी ?  इसके साथ कार में बैठी  रूठी नायिका को साईकिल पर मनाते नायक   या फिर एक साईकिल पर  रोमांस का सफ़र तय करते नायिका -नायक  सबके मन  को हमेशा  भाते रहे  | 
  याद आने लगा   महत्व-- आज कोरोना संकट के बीच पर्यावरण   की शुद्धता के  बीच  लोगों को साईकिल  खूब याद आई |  कोरोना संकट से विचलित  साधन हीन श्रमिक वर्ग  पैदल के साथ बहुधा साईकिल पर सवार हो  सैकड़ों मीलों का  सफ़र   साईकिल से  तय करते देखे गये तो अपनों की फ़िक्र में  भागते   लोग अपनों के लिए साईकिल  के जरिये  अपनों तक पंहुचते देखे गये | सेहत    को बेहतर बनाने के लिए लोकबंदी में कमरों के बीच  लोगों ने साईकिल चलाकर अपनी सेहत खूब संवारी  | इसी तरह आने वाले समय में भी साईकिल के   स्वर्ण युग  की वापसी हो जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी | 

 आज साईकिल दिवस के अवसर पर हमें  साईकिल को एक संकटमोचन  के रूप में याद करना होगा | अपने साथ-  साथ  हमारे बच्चों को भी  साईकिल चलाने के लिए प्रेरित करना होगा ताकि  आलस्य में डूब रही  भावी पीढी अपना स्वास्थ्य,  संवार कर देश की प्रगति  और पर्यावरण  सुधारने में अपना अहम् योगदान दे सके | 

अंत में फ़िल्मी पर्दे से साईकिल   पर  फिल्माया  गया  एक  मधुर  रोमांचत गीत -




चित्र  और तथ्यात्मक  जानकारी -- गूगल से साभार |


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शुक्रवार, 29 मई 2020

ये ठहराव जरूरी था- कोरोना काल पर चिंतन

Cपर्यावरण पर भी दिखा लॉकडाउन का असर ...

कितने सालों से देख रहे थे  ,   अलसुबह  भारी - भरकम   बस्ते लादे-   टाई- बेल्ट  से लैस , चमड़े के भारी जूतों  के साथ  आकर्षक नीट -क्लीन  ड्रेस  में सजा -- विद्यालयों की तरफ  भागता रुआंसा    बचपन  --- तो   नम्बरों की दौड़ और   प्रतिष्ठित  संस्थानों   में दाखिले की धुन में-    आधे सोये- आधे जागते किशोर   और नौकरी के लिए हर तरह का दांवपेंच लड़ाते    अवसादग्रस्त युवा ---! इसके साथ सार्वजनिक      और   निजी वाहनों से अपने  आजीविका  स्थल की ओर भागते लोग  , जिन्हें   सालों से ना पूरी नींद मयस्सर हुई  ना चैन | यूँ लगता था हर कोई भाग रहा  है----  गाँव से   छोटे शहर की ओर -- छोटे शहर से बड़े शहर की ओर और महानगरों से विदेश की ओर   ---! लोगों की ये दौड़ थमने का नाम नहीं ले रही थी ----------! कोई  वज़ह से तो --कोई  बिन वज़ह  भागा जा रहा था -- अपनी ही धुन में --- ! पर   ,अचानक ये क्या हुआ कि जिन्दगी  का पहिया एकदम थम गया  --!  गली - कूचे  वीरान  ,  सड़कें खाली   और हर कोई अपने घर में कैद  !  कुछ समय के लिए तो लोगबाग़ -इस तरह  जिन्दगी की  रफ़्तार पर लगे  इस विराम पर  स्तब्ध रह गये !पर बाद में लगा  -   ये खालीपन  अपने साथ  एक ऐसा सुकून भी  जीवन में  ले    आया है      ,  जहाँ  ना  मजबूरीवश   कहीं  भागने की  अफ़रातफ़री है  , ना किसी   दौड़ में आगे आने की जद्दोजहद | यहाँ चिंता और चिंतन बस एक    बिंदू पर ठहरे हैं --  अपनी  और अपने परिवार की सुरक्षा  ! जो परिवार  सालों से एक  दूसरे के  साथ   मिल बैठ नहीं पाए थे--  उन्होंने    साथ मिलजुल कर यादों की    अनमोल   पूंजी आपस में बाँटी   | जो बातें  परिवार भूल चुका था --वो  भी  दुहराई  गई   |   यानि  इस कथित लोकबंदी  के दौरान भावनाओं   को नया जीवन मिला है --  अगाध आत्मीयता   का सुधारस  रिक्त -मनों को सिक्त कर रहा है | सयुंक्त परिवार की एकजुटता का आनन्द युवा पीढ़ी  ने  इतनी बेफिक्री  के साथ  --  पहली  बार  लिया |सभी को  जीवन का ये    आनंदकाल      अविस्मरनीय रहेगा | 


दायित्व  बोध की जगी भावना  -- लॉकडॉउन ने  विशेषकर  शहरी जीवन में पारिवारिक स्तर पर एक ऐसी क्रांति का सूत्रपात किया है , जो अप्रत्याशित है । घर में सहायिकाओं की छुट्टी हो जाने से परिवार का युवावर्ग,  विशेष रूप से घरेलू दायित्व के प्रति सजग हुआ है। जिनमें कॉलेज जाने वाली बेटियां और ऑफिस जाने वाली बहुएं - रसोई की तरफ बड़े उन्मुक्त भाव से नये - नये पकवान बनाने को उद्दत् हुई हैं, तो बुजुर्गों की खुशी का ठिकाना नहीं , पूरा परिवार जो उनकी आँखों के सामने है। ना किसी को दफ्तर जाने की जल्दी , ना बच्चों के स्कूल की चिंता । शायद आपाधापी में खोई सदी के लिए ये लघुविराम जरूरी था । दुनिया का कारोबार इस दौरान भले  भले चौपट  हो गया  , परिवार में आपसी स्नेह का कारोबार भली भाँति फलफूल रहा है ।  इस  घरबंदी  से आज परिवार फिर से जी उठा   -- --- नये दायित्वबोध के साथ  |सूचना- क्रांति ने इस घरबंदी    को, बोझिलता से बचाया है और रचनात्मकता  को बढ़ाया है | लोगों नेअपने शौक और हुनर   को इस लोकबंदी में  खूब संवारा  |  पढने के शौक़ीन  उन किताबों को बड़े चाव से पढ़ रहे हैं ,  जिनको  इस जन्म में  छूने तक की भी उम्मीद नहीं थी | संगीत  , कला  , साहित्य के लिए ये दौर बहुत   सुखद  है | खूब लिखा जा रहा है -- पढ़ा जा रहा और सीखा जा रहा है |  बड़े  शौक से घर में एक दूजे  से  सीखने - सिखाने की  कवायद जारी है | इस सदी ने ऐसा स्नेहिल दौर शायद पहले कभी नहीं देखा | लोकबंदी में  सभी की  चिंतन शक्ति को विस्तार मिल रहा है | स्वहित और जनहित में ये एकांतवास एक समाधि सरीखा  सिद्ध हुआ | |

 आया कोरोना ---   कोरोना क्या आया एक अघोषित युद्ध की -सी  स्थिति  सामने आ खड़ी हुई |समाज में आपस में  मिलने -जुलने से  एक खौफ सा व्याप्त है ,  हर एक इन्सान के भीतर | जनता-कर्फ़्यू    से लेकर लोकबंदी  से  गुजर कर समाज एक नये   ढर्रे में ढलने को तैयार है  इस दौरान  लोगों  को   चिंतन करने का सुनहरा अवसर  मिला -- भले ही इसकी कीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ी  !यूँ लगा मानों  समस्त  भौतिक  प्रपंच बेमानी हैं | कीमत है तो बस  इंसान की | कोरोना  से भयाक्रांत मानव और समाज  नये   नियम और कायदे गढ़ने को मजबूर हुआ   | कल जो चीजें   जीवन में बहुत जरूरी थी . इस दौरान हाशिये पर आ गयी | मॉल संस्कृति कुछ समय के लिए सिकुड़ कर लुप्तप्राय हो गयी  तो   पीज़ा -बर्गर और सैर - सपाटे सेहत की चिंता के आगे गौण हो गए | घर  सबसे  सुरक्षित स्थान  हो गया तो अपने लोग   सबसे ज्यादा नजदीक |  देखा जाये तो  मानव की पलायनवादी   प्रवृति अक्सर उसे कोरोना  जैसे संकट में  डाल देती है , पर साथ ही उसे  एक  सबक देकर  भविष्य के लिए तैयार करती है | कोरोना ने भी मानव समाज को बहुत कुछ सिखाया है | मानव सभ्यता पर आये आकस्मिक संकट कोरोना के बहाने -  एक विराट विमर्श  की शुरुआत हो चुकी है | आने वाले समय में इस पर किये गये शोध -इस स्थिति का सही -सही मूल्याङ्कन करेंगे कि समाज ने इस महामारी   के  दौरान क्या खोया और क्या नया सीखा !

 नये रूप में धर्म ---   धर्म की स्थापना शायद जीवन में कल्याणकारी   नैतिक मापदंडों की  सीमायें तय करने के लिए हुई थी , जिसमें जीवनपर्यंत बहुजनहिताय सुकर्म  की  प्रेरणा  और जीवनोपरांत मोक्ष   पाने के प्रयासों  का  प्रावधान किया था  ,  पर  बौद्धिकता    के अनावश्यक  हस्तक्षेप से  आज धर्म   कुत्सित  रूप   में  परिवर्तित  हो गया है    | धर्मान्धता से  मानवता  को जो हानि हुई  -उसके सही आंकड़े  कहाँ  उपलब्ध हैं ? पर ये संतोषप्रद  है , कि इस संकटकाल में  धर्म अपने परिष्कृत रूप में सामने आया है , जहाँ  पाखंड और  कर्मकांड  नहीं ,  अपितु  मानव सेवा से ही धर्म को सार्थकता मिल रही है | गोस्वामी  तुलसीदास जी की मानव धर्म की महिमा बढ़ाती   उक्ति गली- गली . कूचे -कूचे चरितार्थ हो रही है   , ''परहित सरस धर्म नहीं भाई   ।'' इसी को  चरितार्थ करते  और मानव धर्म निभाते चिकित्सक , और अन्य कोरोना योद्धा ,  मानवता और सद्भावना के शांतिदूत बनकर आमजन की आँखों के तारे बने हुए हैं और दुनिया को समझा रहे हैं कि यही है सच्चा धर्म - ----! निस्वार्थ कर्म जो केवल और केवल मानवता को समर्पित है,  जिसमें त्याग भी है , सद्भावना भी है- सच्चे मानव धर्म के रूप में उभरा  है  | हो सकता है कोरोना की महामारी लोगों को   स्थायी   तौर  पर  ये जरुर समझा दे कि सच्चे धर्म की परिभाषा क्या है  और साथ में ये भी ,  कि आज देश को देवालयों  से कहीं ज्यादा  ,  चिकित्सालयों  और शिक्षालयों की    आवश्यकता  है |


  चकित कर रहे ये बदलाव ---- लोकबंदी के दौरान दुर्घटनाओं और . आत्महत्याओं में कमी के साथ प्रदूषण का घटता स्तर  बहुत सुखद  लगा । भागती-दौड़ती जिन्दगी  ने खुलकर साँस  ली  | साथ में रोचक है -- सुबह -सुबह शोर  प्रदूषण में अपना अतुलनीय योगदान देने वाले -- धर्म स्थानों पर मौज कूट रहे कथित धर्मावलम्बियों की जमात , ना जाने किसे मांद में जाकर छिप गयी है  !! --- होई हैं वहीँ जो राम रचि राखा पर -- उन्हें आज कतई विश्वास नहीं हो रहा | वे कोरोना से इतना भयाक्रांत हो गये हैं,  कि उनके दर्शन दुर्लभ हो गये हैं | जिन्हें ना किसी बीमार की चिंता , ना परीक्षाकाल में छात्रों के भविष्य की चिंता थी  -- जो बस लाउड स्पीकर में भजनों के द्वारा- भीषण हाहाकार को ही धर्म की शक्ति मानते थे - आज मौन हैं !कथित उपदेशक बाबा लोग तो अदृश्य से होगये हैं | उन्हें  जाने  कैसा सदमा लगा - समझ नहीं आता | पर उस अनचाहे शोर से मुक्ति ने आमजन की नींद को बहुत मधुर बना दिया है तो एकाग्रता को बढ़ा दिया है |

निखरी नये रूप में प्रकृति -- प्रकृति  के लिए आमजन ने जो किया --उससे उसकी कितनी हानि  हुई --- इसके  सही -सही आंकड़े उपलब्ध नहीं,  पर इतना तो तय है  , कि हमने  उसे  कुरूप करने में कोई कसर नहीं छोडी |  धर्मयात्रायें मौजमस्ती का माध्यम बन गयी | बड़े  बुजुर्गों   से  सुना करते थे --  कि कभी  जटिल तीर्थ स्थानों की यात्राओं   के लिए सिर्फ बुजुर्ग लोग ही जाते थे  , वो भी  सर पर कफन  बाँध   कर  ,  ताकि  उनके  जीवन का अंत यदि इन यात्राओं के दौरान हो जाए तो उन्हें मोक्ष मिल जाए  |  पर कालान्तर में   लोगों ने  इसे पारिवारिक आनन्द का माध्यम मानकर सपरिवार जाना  शुरू कर दिया |  पहाड़ों - पर्वतों पर  तीर्थ  यात्रियों की सुविधा के लिए  निर्माण हुए  -- सड़कें बनी , होटल  निर्मित किये गये और इन  प्रक्रियाओं में प्रकृति अपना सौंदर्य गंवा बैठी |  अब लोकबंदी के दौरान सोशल मीडिया पर आने वाली सुखद तस्वीरें बता रही हैं  , कि करोड़ों रूपये की परियोजनाएं जो  ना सकी वह लोकबंदी ने कर दिया | निखरे पहाड़ - पर्वत  और घाटियाँ  , उन्मुक्त उड़ान भरते पक्षी दल   ना जाने कितने दिनों बाद नजर  आये | नदियाँ   निर्मल हो मन मोह रही हैं |प्रदूषण का  स्तर घट रहा है  |   शासनादेश को जनहित में पहली बार लोगों ने बहुधा ईमानदारी से अपनी स्वीकार्यता  दी , जो  नितांत संतोष का विषय है |

 करुणा के नाम रहा संकटकाल -  कोरोना काल में लोगों ने सदी की सबसे करुणा भरी तस्वीरें  देखी| दूरदराज गाँव से आजीविका के लिये  आये  श्रमिक  वर्ग  की विकलता ने  जनमानस  को  भावविहल कर दिया |हफ़्तों पैदल गाँव- गली की और भागते  साधनविहीन लोग और उनके साथ हुई अमानवीयता   --   पहले कभी नहीं देखी गयी | मजदूर वर्ग ने पग- पग पर  अनगिन   विपदाओं का सामना किया  |  बहुत  बड़ी संख्या   में उनकी मौतों ने सम्पूर्ण  मानवता को शर्मसार और स्तब्ध  कर  किया  !  अपने गाँव - गली लौटकर अपनी जड़ों में समाने को आतुर-   कम शिक्षित   श्रमिकों के रूप में सामने आई  सामूहिक  भावना अपठित और अबूझ है | शायद आत्मीयता के इस अद्भुत रसायन का कोई विकल्प संसार में नहीं | और कोई प्रयोगशाला इसका विश्लेषण कर पाने में सक्षम हो--- ऐसा नहीं लगता |    माटी के लाल श्रमवीर ने जो संस्कार  संजो कर रखा है --वह है जननी , जन्म भूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है | शहर में बहुत साल बिता देने पर भी उसे छोड़ते समय उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता , पर गाँव में बहुत कुछ है जिसे वह गाँव से पलायन के समय छोड़ आया था-- जो उसे लौटकर फिर मिल जाएगा |  अपनी माटी की गंध उसे हमेशा अपने भावापाश में बांधे रखती है |  उनके असुरक्षित मन का एक मात्र सुरक्षा कवच , मानो उनकी जन्म भूमि ही है। उनकी छटपटाहट कोई राजनैतिक स्वांग नहीं ---उनकी अपनी माटी और अपनों के प्रति अगाध आत्मीयता है, जिसे वे सबको बताना चाहते हैं!उनकी प्रगाढ़ आत्मीयता को शहर की चकाचौँध अभी तक आच्छादित नहीं कर पाई है , क्योंकि  वह प्रगति के उस शिखर को कभी  छू नहीं पाया -जहाँ संवेदनाएं शून्य हो जाती हैं ।यूँ भी जीवन ऐसे वर्ग के प्रति बहुत अधिक कठोर रहा है ,  जैसे   उसके गाँव प्रयाण में भी उसने बहुत परीक्षाएं दी हैं   , जिनमें वह बहुधा अपनी जीवटता से विजयी  माना गया है |  उसकी जीवटता को कोरोना संकट ने और प्रबल कर  दिया |   अंतस में   असीम   करुणा जागते .  मानवसंघर्ष   के ये   पल  जनमानस के लिए  अविस्मरणीय रहेंगे   और  इनकी स्मृतियाँ  मन को    सदैव  विचलित  करती रहेंगी |


जीना होगा कोरोना के साथ --    सदियों से ही दुनिया  महामारियों से बहुत त्रस्त   रही   है |नाम बदल-बदल कर , नए नए रूपों में बीमारियाँ मानव को सताती रही हैं  और अनगिन जिंदगियां लीलती रही हैं क्योंकि किसी भी अप्रत्याशित  बीमारी का उपचार उसके आने  से पहले पता हो ये  शायद मुमकिन नहीं | इसी तरह कोरोना के उपचार के  साधन ढूंढें जा रहे हैं  | दूसरे शब्दों में कहें , कोरोना जैसी महामारी   के एकदम  मिटने  की कोई गुंजाईश फिलहाल नजर  नहीं आती  , पर  फिर भी अपनी सजगता और समर्पण  से हम इसे काबू जरुर कर सकते हैं | स्वच्छता  के साथ सामाजिक  दूरी का पालन करते हुए हमें उन  दुर्व्यसनों को छोड़ना होगा ,  जो  बढ़ती सम्पन्नता  से पैदा हुए थे | माल  और बार संस्कृति   से  दूरी बनानी होगी , तो  अनावश्यक  भीड़ का मोह त्यागना होगा | साथ में लोकबंदी के दौरान मिले आत्मीयता  के संस्कार को दीर्घजीवी बनाना होगा  , तभी हम इस विपति  से पार आ पाएंगे | तेजी से भाग रहे जीवन का ये ठहराव - काल  यही कहता है कि हमें वैभव विलास से   इतर  अपने  बारे में -- अपने अपनों के बारे में या फिर देश - समाज के कल्याण  के  बारे में  जरुर  गंभीरता  से सोचना होगा | बहुत ज्यादा बड़े नहीं , बल्कि छोटे से छोटे प्रयास जीवन में  बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं |  दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं ,  कि जीवन में ये ठहराव आवश्यक था -- जो हमें सब कुछ गंवाने के स्थान पर -  बचे हुए को  सहेजने की अनमोल सीख देकर जा रहा है |


ईश्वर से प्रार्थना है महामारी कोरोना का ये भीषण संकट काल मानवता  का  नवप्रभात हो |



             

चित्र ---  गूगल  से साभार | 

शुक्रवार, 8 मई 2020

सामूहिक भाव संस्कार संगम -- सबरंग क्षितिज [ पुस्तक समीक्षा ]

सबरंग क्षितिज:विधा संगम 2019

साहित्य   को समाज का दर्पण और व्यक्ति के विचारों की अभिव्यक्ति का    सशक्त  माध्यम कहा गया है |
यह शब्द , अर्थ और भावों की त्रिवेणी  है   जो व्यक्ति को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर.  उसे दायित्वबोध
कराते हुए,  उसकी रचनात्मक प्रतिभा को सार्थक करती है | वैसे भी   आज जो लिखा जा रहा है वह आने वाले कल का इतिहास है | आने वाली पीढियां शब्दों के माध्यम से आज का  अवलोकन करेंगी | क्योंकि  संसार में कुछ भी स्थायी नहीं |समय निरंतर परिवर्तनशील है इसलिए  साहित्य इस परिवर्तन के समानांतर चलते हुए शब्दों द्वारा इनका अवलोकन और  विश्लेषण करता है | किसी समय  साहित्यार्जन  में रचनाकार को बहुत सी चुनौतियों   का सामना करना पड़ता था | बहुधा बहुत प्रतिभाशाली लोगों   का लेखन डायरी तक सीमित रह जाता था और  पाठकों तक  ना पहुँचने  की दशा में  वह यूँ ही नष्ट  जाता  था  | पर आज के    सूचनाक्रांति के युग में   प्रतिभाशाली व्यक्तियों के लिए  , रचनात्मक प्रतिभा के  विस्तार  के लिए किसी मंच की   कोई कमी नहीं | सोशल मीडिया  के जरिये अनगिन लोग अपनी अभिरुचियों  को  संवार रहे हैं,  जिससे उन्हें  अभूतपूर्व पहचान  मिली  हैं |ब्लॉग भी  इन मंचों में से एक सशक्त  मंच हैं   |  लेखन में रूचि रखने वाले लोग , बड़े  उत्साह  से इसका  प्रयोग कर , अपनी प्रतिभा  को अनगिन लोगों तक पहुँचाने में  सफल हुए हैं |सबसे बड़ी  सुविधा है कि  उन्हें किसी अन्य सशक्त  मंच की राह देखनी नहीं पडती |  वे  अपने  प्रकाशक और प्रचारक खुद  हैं  |  आज हजारों लोग ब्लॉग लेखन  के जरिये साहित्य  भण्डार को समृद्ध कर रहे हैं  , जिसके माध्यम से  बहुत सारे  सशक्त    रचनाकार सामने आये हैं   | यूँ तो आजकल स्थापित  लेखकों के भी ब्लॉग हैं पर मुझे लगता है  ,   ब्लॉग लेखन असल में  उन लोगों के लिए ज्यादा  सार्थक  है जिनकी पत्र - पत्रिकाओं  तक पहुँच  नहीं है और उनके भीतरत मिल जता है |   ब्लॉग लेखन  -  रचनाकार की  प्रतिभा को निखारते हुए उसे  एक विद्यार्थी की तरह  दिनोंदिन सीखाता है |  रचनायात्रा  के इसी क्रम    में किसी ब्लॉगर के लिए वह दिन बहुत   ही  अविस्मरनीय होता है जब उसका लेखन पुस्तक रूप में पाठकों के सामने आता है | | पिछले दिनों मुझे देश के प्रमुख दस ब्लॉगरों  की  की सांझा पुस्तक  ;; सबरंग  क्षितिज  -   विधा   संगम पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ |
 जैसा कि नाम से विदित होता है ,  इसमें  दस  रचनाकारों की    उल्लेखनीय रचनाएँ  संकलित की गयी हैं  जिसमें गद्य और पद्य  दोनों प्रकार की  रचनाएँ  शामिल हैं |सबरंग क्षितिज के सूत्रधार  जाने -माने  ब्लॉगर और साहित्य साधक  रवीन्द्र सिंह यादव जी हैं  ,  तो  संयोजक  दूसरे अतिउत्साही    ब्लॉगर  और  शब्दसाधक  ध्रुव सिंह ' एकलव्य 'हैं , जिनके मिले जुले प्रयासों से यह सुंदर पुस्तक  अस्तित्व में आई है |पुस्तक में गद्य और पद्य दोनों विधाओं  को स्थान दिया गया है |  कविता में हाइकू , गीत , ग़ज़ल  , क्षणिकाएं इत्यादि  शामिल हैं तो गद्य प्रकल्प में   लेख और  कहानियों  को स्थान मिला है |
 इस पुस्तक के वरिष्ठ संपादक के रूप में ब्लॉगर और साहित्यकार  विश्वमोहन जी ने   रचनाकार के रूप में    अपना अतुलनीय सहयोग दिया ही  है , इसके साथ  पुस्तक की   रचनाओं को अपनी    समीक्षक  दृष्टि  से परख बहुत ही विद्वतापूर्ण  भूमिका  पाठकों के समक्ष  रखी है | इस  समीक्षा  में उन्होंने अपनी साहित्यिक  समझ  और   सूक्ष्म  विश्लेषण क्षमता का भरपूर उपयोग किया है |   समग्र साहित्यिक विशेषताओं की   दृष्टि से आंकते हुए  प्रायः सभी रचनाकारों    की रचनाओं पर उनका  गहन चिंतन -      उनके भीतर के गंभीर पाठक  से परिचय कराता है |   भूमिका    में रचनाओं  की समीक्षा के साथ साथ  समूचे  साहित्यलेखन   पर  उनका चिंतन  पाठकों के ज्ञान में   वृद्धि करता है |उन्होंने  सृजनात्मक     चिंतन  को परिभाषित  करते हुए   लिखा है,

 '' यह  चेतना की तुरीय अवस्था   है जहाँ आत्मा का परमात्मा में विलय हो  जाता  है  , अपने पराये के भेद  मिट  जाते हैं   और भाव के स्तर  पर  ' आत्म '' सर्वात्म ' हो  उठता  है |प्रकृति का प्रत्येक परमाणु प्राणवंत हो जाता है |फिर आत्मा सृजन के श्रृंगार  में सज जाती है | दुःख दूसरों के और आँखें हमारी और अश्रुनीर भी हमारे |''

कविता को बहुत ही भावपूर्ण शब्दों में परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं ,

'' कि  सूक्ष्म की व्यथा के इस विराट में  प्रसार  की वेदना प्रसव पीड़ा से भी अधिक मर्मान्तक      होती है |और इसी पीड़ा की कोख से कविता का जन्म होता है |  ''

सच है  पीड़ा से जन्मी कविता के  भीतर से ही   मानवता  का उदय  और  पोषण होता है  |         
  दूसरे शब्दों   में   हम  कहें ,कविता ही  साहसिक   ढंग  से  सच्चाई को,  दुनिया के आगे रखने का जोखिम उठाती है |  |   काव्य की  इन्हीं   विशेषताओ से युक्त सार्थक , सरस  कविताओं  को इस पुस्तक में स्थान मिला है |

 पद्य खंड  --

सबरंग क्षितिज के पहले  खंड में काव्य  रचनाओं  को स्थानं मिला है , जिनमें  काव्य की हाइकू ,गीत , ग़ज़ल , मुक्त छंद , छंदात्मक   इत्यादि   विधाएँ हैं | 
     दिवंगत पिता के जीवन के अंतिम पलों में        पक्षाघात से जूझते  हुए    , उनकी असहायता     और  मौन दैहिकभाष्य    को   एक बेटी ने आत्मा की  अतल गहराइयों के अनुभव किया  और उस अनकही पीड़ा को शब्द देते हुए, "अनीता  लांगुरी '' ने  एक अत्यंत मर्मान्तक  काव्य चित्र   रच डाला  जिसके हर शब्द में     दैहिक ,मानसिक  अवशता     से जूझ रहे   व्यक्ति  की  वेदना समाहित है | |   मानों   वे कह रहे हो -
 कैसा जीवन है,
धत्त !जीवन भर पैसे-पैसे की दौड़ लगाई//
रिश्ते-नाते तमाम उम्  //उलझा रहा इसी झंझावात में आज मर रहा हूँ  ...   अकेला ////

 एक दूसरी कविता में  कवियित्री  अंतरंग प्रेम की  मधुर यादों को   संजोकर   प्रिय से  मानों  साथ का  अनुबंध  करना चाहती है ,पर   समय   ऐसानहीं चाहता |क्योंकि हर काम व्यक्ति की इच्छानुसार होना  नामुमकिन है | फिर भी  यादों को संजोना मन की  शाश्वत  प्रवृति है --
  धीरे - धीरे तुम्हारी छवि, / धूमिल होने लगी है ---!  //पर तुम्हारी यादें नहीं /जानती हूँ तुम साथ नहीं हो /पर जब भी ये घने जंगलों के साये मुझे  डरायेंगे ---!/तुम उस वक्त मेरे पास रहोगे मेरी परछाई  बनकर ---!//
स्वेटर की बुनाई   में ,    एक- एक फंदे के साथ  प्यार भी बुना जाता है  | पर  समय के साथ जब प्रेम का रंग बदरंग होने लगता है ,
तो पुराना हो चुका गुलाबी स्वेटर प्यार की उसी गर्माहट को याद दिला ही देता है --  

याद आती वह   बातें तुम्हारी //तुम बुनती रहीं   रिश्तों  के महीन धाग//और मैं  बुद्धू  //    अब तक उन रिश्तों  में /// तुम्हें ढूंढतारहा// 

अपर्णा वाजपेयी जी  की कवितायेँ  अपने भीतर     अलग  तरह की वेदना समेटे   है |  देश , समाज में   मिट रहे नैतिक मूल्य उनकी रचनाओं  का  मूल स्वर हैं जो पाठक को झझकोर देता है  |विचारणीय मर्मान्तक  मुद्दों पर हो रही  निम्न स्तर की राजनीति  कवियित्री को भीतर तक आहत करती है |  संपन्न लोगो के हाथों विपन्नता  से घिरे मजलूमों  के शोषण  का पर्दाफाश करती सशक्त दीर्घ कविता  में  वे लिखती हैं --

 हम चौराहे पर निर्वस्त्र  औरतों के शरीर   का     /  मांस तोलरहे हैं ,/ना जाने कब देह का दाम बढ़ जाए !/खरीद बिक्री जोरों पर है ,/बच्चों की पुतलियों का दाम बढ़ रहा है लगातार /और देह !/उसके  खरी दार लाइन में लगे हैं ,/करोड़ों फेंक रहे हैं ------/गर्भ का बोझ धो रही हैं विधवाएं ,/ना जाने कब ---/बच्चा जनने लायक ना रहें , /कर दी जाएँ मंदी से बाहर |/सूना है बनकर ख़रीदे बेचे जा रहे हैं ----/हो कहीं परमाणु हमला /तो बच सकें अमीर---/



तो वहीँ उनकी कलम, अपने वैभव में खोये इंसानों को खान मजदूरों का  शोक गीत  सुनाती  है  ,   जिनके पुनर्वास  के नाम पर अनगिन योजनायें सुनने में आती हैं , पर उनका नसीब ज्यों का त्यों है | वे लिखती हैं - 

कोयला खदानों में काम करते मजदूर, /गाते हैं शोकगीत,/कि टपक पड़ती है उनके माथे से /प्रतिकूल परिस्थितियों की पीड़ा,/उनके फेफड़ों में भरी कार्बन डाई आक्साइड/सड़ा देती है उनका स्वास्थ । /धरती के ऊपर भी, नीम अंधेरा /तारी रहता है उनके मष्तिष्क पर./अँधेरे के बादल बरसते है,/सुख का सूरज उन्हें दिखाई नहीं देता। ///

 वहीँ शहरीकरण की चकाचौंध के  बीच  भी  गाँव  की माटी के  में पगे संस्कारों को  अपने अंतस में संजोये  आग्रह  करती हैं    ----

जब भी आना गाँव की माटी लिए आना /हो सके तो  दूब की बाती लिए आना //

पुस्तक में संकलित कविताओं में नीतू ठाकुर के  लेखन से सघन भावनाएं  अनायास छलकती हैं |  यहाँ  वीतरागी  मन   के  जीवन से शिकवे भी हैं और   नारी मन  की अनकही वेदना भी |दिवंगत माँ की ममता   की सघन  छाँव   की  अनुभूति,  उनके ना रहने की स्थिति में भी कभी कम नहीं होती  , क्योंकि माँ- बेटी का नाता अटूट है --जीवन के साथ भी और उसके बाद भी | वे उनकी दुआओं  पर अगाध  विश्वास करते हुए- किस्मत को ललकारती दिखती हैं --

जब कभी आते ही  तूफ़ान घेरने  दिल को मेरे /लडती है तूफानों से आंचल में छुपाते है मुझे //बनके परछाई वो हर पल साथ -साथ चलती है /अब जुदा करके दिखा किस्मत मेरी माँ से मुझे //

 काव्य की  आकार  में   बहुत छोटी विधा ' हाइकु ' में नीतू जीने बहुत प्रभावी हाइकु लिखे हैं --

सबसे अच्छा- एकतरफा प्यार - ना  जीत ना हार //-------टूटते घर  -आसूं थे बेअसर -हुए बेघर //----पंछी परदेशी - पहनावा था देशी -  सोच पुरानी//

 एक   अन्य कविता में नारी की अखंड  महिमा दर्शाती रचना में  वे लिखती हैं --
एक   अन्य कविता में नारी की अखंड  महिमा दर्शाती रचना में  वे लिखती हैं--    
है ब्रह्म ज्ञान सी नारी  भी , उस जैसा कोई   महान  नही/
जो समझ सके उसके  मन को  इस काबिल   ये इन्सान नहीं      ///////

पम्मी जी का  मखमली उर्दू - हिंदी   लेखन बरबस   मन को छूता है | 

हाइकू      विधा       में सृजन की  उनकी    परिभाषा ही निराली है --- 
                

सृजनता का-     पहलाकदम  है -   बिखर जाना //////
इक परिंदा - शज़र की है चाह  - गर्म पहर //- उड़ने भी दो --परिंदों को फिजा में--- पंख फैलाए 

किसी बहुत अपने    के आकस्मिक विछोह से स्तब्ध और  उनकी  स्मृतियों     से सामना करते   हुए    भावातिरेक में  लरज़ते  शब्दों   की लार्ज़िश    सहज ही महसूस   की जा सकती है 
उलझ रही हूँ-/सजदों के लिए,/लर्जिश है  /हर शब्दों में क्योंकि   / कभी दुआ  नहीं माँगी थी  /आप के होते हुए... /////// 
जब  दर्द की अतिशयता में अधर मौन हो जाते हैं तो आँखें उस दर्द को चुपचाप ब्यान कर देती हैं | इसी स्थिति  को बड़ी कोमलता   से शब्दों में पिरो कवियित्री  लिखती हैं -

जो तनहा, नहीं सरगोशियाँ थीं,/ कई मंजरो की,तमाम गुजरे,/ पलों के फ़साने दफ़्न कर../ लफ्ज़ों  ने उन लम्हों से शिकायत की./  जिंदगी की राहों से जो गुज़री हो// जो ज़मीन न तलाश कर सकी /,मसाइलों की क्या बात करें.../ये उम्र के हर दौर से गुज़रती है/////

सुधा  सिंह; व्याघ्र ' जी   की  रचनाएँ   युवा मन की  भावनाओं  को मार्मिकता से प्रस्तुत करते    प्रश्न  खड़े करती हैं |   बेरोजगार  युवा   काम ना होने पर भी व्यस्त क्यों हैं  अपनी रचना ' व्यस्त हूँ   मैं  '' में   वे लिखती  हैं -- 

घरवालों को किया हुआ वादा/भी पूरा नहीं कर पाता हूँ !/देर शाम जब घर की /दहलीज पर पहुंचता हूँ तो /उनके मुख पर एक प्रश्नचिह्न पाता हूँ !/एक मूकप्रतीक बन/स्तब्धता से खड़ा रह जाता हूँ !/और सिर झुकाकर अपनी /लाचारी का परिचय देता हूँ !/मेरे पास किसी को देने के लिए/कुछ भी नहीं है, जवाब भी नहीं है! /इसलिए कि व्यस्त हूँ मैं .///

वहीँ दूसरी रचना में वे   समय    की  तेज रफ़्तार  से , पल - पल   समाप्त होते जीवन    और नजदीक आती मौत  की प्रतीक्षा में उलझे मन की दशा को  बखूबी शब्दों में लिखते हुए कहती हैं --

उम्र की साँझ ढलने को है, /कितना कुछ छूट गया पीछे,/खड़ा हूँ,/ अतीत के पन्नों को पलटता हुआ,/भूतकाल की सीढ़ियों से गुजरता हुआ!/पुरानी यादों के कुछ लम्हे,/खुशियों और गम में बंटे हुए!/खोकर कुछ पाया था !/पाकर कुछ खोया था ///

  बहुत कुछ पाने के बाद भी बची ख्वाहिशों  को पाने की जिद में   वे    जिदंगी से   मनुहार करती हैं  ---

जिंदगी /तेरा हसीन रूप ही अच्छा है।/तू हमें किसी जंजाल में उलझाया न कर।/तू दोस्त बनकर आती है तो सबके मन को भाती है।/यूँ हमें अपनी सपनीली दुनिया से दूर न कर।/भूलना मत../मेरी फरमाइशें अभी बाकी है ।/कई ख्वाहिशें अब भी बाकी हैं/////


पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा जी की  कविता      प्रकृति  से संवाद करते हुए ऐसे प्रश्न करती हैं, जिनमें जीवन का  सार  छुपा है | निर्झर से बहते भाव  कविता को  सहजता से सरस  प्रवाह देते हैं |अकेले प्रेम की कल्पना करते हुए  कवि  प्रकृति को  अपनी इच्छानुसार  अलग कलेवर में  रंगना  चाहता  है  जिसमें  विरह - वेदना की छाया तक ना हो --  सृष्टि में सब   आह्लाद भरा हो -- --- 

कोशिशें अनवरत करता हूँ कि,/कंटक-विहीन खिल जाएँ गुलाब की डाली,/बेली चम्पा के हों ऊंचे से घनेरे वृक्ष,/बिन मौसम खिलकर मदमाए इनकी डाली,/इक इक शाख लहरा कर गाएँ प्रेम,/न हो कोई भी बाधा, न हो कोई सीमा प्रेम की...../यूँ जारी है मेरी कोशिशें, अकेले ही प्रेम लिखने की /// 


उम्र  से अधूरी  ख्वाहिशों  को पूरा करने   के लिए  कवि मन उसे अपनी रफ्तार  धीमी  करने      का आग्रह  करता है -----

ऐ उम्र, तूने उड़ान यह कैसी भरी ?/पल में ही सदियाँ ये   गुजर गयी /ख्वाहिश जीने की थी अभी अभी /फिर क्यों , तुझे जाने की है ऐसी जल्दी ?/


किसी अपने के बहुत दूर जाने की वेदना में वे ईश्वर से भी प्रश्न करने से नहीं  चूकते --

टटोलती हर पल हृदय के तार सदा तुम पास रहे मेरे,/पर  क्यों  विधाता को न आई ये रास,/ क्यूं  छोड़ गए तुम साथ,/ईश्वर से पूछूँगा जीवन के उस पार तुम  क्यूं  साथ नहीं हो मेरे?////


'श्वेता सिन्हा  '  जी ने  भावों की  तूलिका से शब्दों में रंग  भरते हुए   अपनी रचनाओं को संवारा है | पुस्तक में संकलित उनकी  क्षणिकाएं  थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह जाती हैं  --

ब्रह्मांड के कण कण /में निहित।/अभिव्यक्ति/होठों से कानों तक/सीमित नहीं,/अंतर्मन केविचारों के चिरस्थायी शोर में/मौन कोई नहीं हो सकता है।///----------


बंधन  /हृदय को जोड़ता /अदृश्य मर्यादा की डोर है।  /प्रकृति के नियम को  /संतुलित और संयमित  /रखने के लिए।/////


 जब शब्द मौन जाते है तो भाव   आँखों  से    अनायास  छलक जाते हैं | एक   भावपूर्ण  गीत में वे लिखती है - --

शब्द हो गये मौन  सारे  -- भाव नयन से लगे टपकने /अस्थिर चित्त बेजान देह में - मन पंछी बन  लगा   भटकने ///साँझ क्षितिज पर  रोती किरणें / रेत पे बिखरी मीन  प्यासी ,/कुछ  सुने ना  ह्रदय है बेकल /धुंधली राह ना टोहजरा  सी ////


जीवन की   आपाधापी      में  हम वह सब  खो देते हैं ,जिसकी हमें सबसे ज्यादा  चाह होती है | इन्हीं  मर्मातक भावों को खूबसूरती से    हृदयस्पर्शी  रचना में समेटती वे लिखती हैं -----

जद्दोज़हद में जीने की, हम तो जीना भूल गये /मधु भरे थे ढेरों प्याले, लेकिन पीना भूल गये।।/बचपन अल्हड़पन में बीता, औ यौवन मदहोशी में /सपने चुनते आया बुढ़ापा, वक्त ढला खामाशी में।/ढूँढते रह गये रेत पे सीपी, मोती नगीना भूल गये /मधु भरे थे ढेरों प्याले, लेकिन पीना भूल गये।////


ध्रुव सिंह 'एकलव्य ' जी की एक मात्र काव्य रचना  'आह्वान ' पुस्तक  में आई है  |  आशा  भरे इस  सरस , मधुर गीत  में जीवन  में  सकारात्मकता का  आह्वान  किया  गया है |  सरल  शब्दों में  गुंथे  भाव सहज ही  मन को स्पर्श करते हुए   भीतर     नवआशा  का संचार करते हैं --

झिलमिल -झिलमिल   /  पंखों  वाली /नाचे बगिया /  डाली- डाली /तू दूर देश से  आयी है / लेकर सपने रंगीन बहुत /पंखों  में  तेरे रत्न जड़े  /चमकें जैसे हों फूल खिले /लिया क्या रंगों की समझाऊँ ,मिलते जैसे हों अलख जगे / झिलमिल -झिलमिल   /  पंखों  वाली /नाचे बगिया /  डाली- डाली ////"रवीन्द्र  सिंह यादव जी ने  अपनी एक दीर्घ कविता और हाइकुओं के रूप में अपने दो   रचनाओं  के रूप में , पुस्तक में  योगदान  दिया है |    

 उनके   हाइकु  'हाइकु    '  विधा पर खरे  उतरते हैं| सभी हाइकू   बसंत के मौसम पर हैं , जिनमें  बसंत     विभिन्न    भावों में शब्दों में  जीवंत होता है -- 

छाया बसंत -है बसंत बहार -मुदित जिया //बौराए आम -फूली पीली सरसों -हँसे किसान /// ढ़ाक पलाश -सुर्ख- हुआ जंगल - महके फूल /    सूनी है साँझ -चंदा चुपचाप क्यों , रोया  चकोर -//// बुझते दिए -  मायूसियों  के साये ,  आ  जाओ पिया///////

  प्रकृति  कभी  स्वार्थी नहीं होती  चाहे हम उसके साथ  जो  भी व्यवहार करें | इसी भाव को  रवीन्द्र जी की एक दीर्घ कविता में , एक पेड़  की व्यथा- कथा  माध्यम से  , बहुत प्रेरक  ढंग से लिखा गया है |जिसमें  
सूखे पेड़ की छाल  का एक टुकडा जो    एक  आँधी के झोंके से गिर पड़ता है|   हालांकि,  उसके गिरने से किसी  का कोई  नुकसान नहीं होता  ,    फिर भी  स्वार्थी लोग उसके  विशालकाय शरीर से डरते हुए ,     उसके  फल , फूल , छाँव   इत्यादि सब उपकार  बिसराकर उसे  मिटाने  को उद्दत  हो  उठते   हैं  और यहीं से  उसे कटवाने की धुन में  ना जाने कितने स्वांग शुरू हो जाते हैं  |  अपने यौवन की मधुर स्मृतियों को संजोते वृक्ष को  कहीं ना कहीं उन स्वार्थी लोगों से एक आस रहती है जिनके जीवन में उसका अहम् योगदान रहा है | नाजाने कितनी   ही  जीवंत अनुभूतियों  का साक्षी रहा व्यथित पेड़ बस सोचता ही रह जाता है --- 

मैं गवाह हूँ बहुतेरे  खट्टे मीठे कसैले किस्सों का ////मेरे साये में बैठकर / कितनी मौलिक  कहानियां कही गयी /प्यार और दर्द के अनसुने अफसाने सुने //वेदना से कराहते लोगोंकी आहें - चीखें -// सोचो !मुझसे कैसे सही गयी ---!

अपने यौवन में  बहार  के विभिन्न  रंग की यादें  उसके मन को  वेदना से भर   जाती  हैं |पर उसकी छाँव में , अपने जीवन के अनगिन  अंतरंग क्षण जीने वाले लोगों  को उसके उपकार जरा भी याद नहीं आते ||इन्हीं सपनों से  बाहर आकर उसे  जब  अपने मिटते अस्तित्व का आभास होता है तो वह ईश्वर से-- भगवान् ईसा मसीह की तरह  यही प्रार्थना करता है-----

 कि हे परमात्मा |/सुनो मेरी निदा /सुनो मेरी  जुस्तजू /  नादान  मनुष्य को   // माफ़ करना ---!///////

  


इस पुस्तक  की  भूमिका- लेखन     के दायित्व  का निर्वाह  करते   हुए   विश्वमोहन  जी ने अपनी रचनाओं को परखने का  भार अपने पाठकों को सौंपा है |    सुघढ़ अलंकारिक  शिल्प में  ढली    उनकी कवितायेँ भाव   और कला पक्ष से बहुत समृद्ध  हैं  , जिनका   शब्द -चयन पाठकों को विस्मित कर देता है | अलंकार की टूटती सांसों में उनके  प्रयोग संजीवनी   बनकर  घुल रहे हैं  |आज जहाँ कविता मेंअंलकार देखने को भी नहीं मिलते  वहीँ    चमत्कृत  रूप से अनुप्रास को  नवजीवन देती ,उनकी कवितायेँ  साहित्य   में अतुलनीय योगदान दे रही हैं | यहाँ प्रेम  लौकिक नहीं | उसका सीधा सम्बन्ध आत्मा - परमात्मा से है  ---- अंलकार से सुसज्जित  पंक्तियों का भाव पक्ष  मुग्ध करता है -- 

अमरावती की अमर वेळ तू  /मदन प्रेमघन मधुर मेल तू /तरुण कुञ्ज तरु लता पाश  / वृंदा वन वनिता विलास,/  कान्हाकी मुरली के अधर     / हे प्रेम पिक के कोकिल स्वर!///
किस ग्रन्थ गह्वर के  राग छंद ये गाई,  /लयलासलोललावण्य घोल तू लाई /मन मंदिर में तू, मंद मंद मुस्काई /प्राणोंमें प्रेयसी, प्रीत प्राण भर लाई ////  

आलौकिक प्रेम से सराबोर और दिव्य भावों से सजी   रचना में माधुर्य      की बानगी ----

 बनूँ  जुगनू जागूं जगमग कर,/रासूं राका संग सुहाग भर./राग झूमर सोहर झुमकाऊँ,/आज जो जोगन गीत वो गाऊं////

प्रेम सखा संग   प्रीत  समाधि  कीकल्पना  पाठकों को चकित कर देती है --------

प्रीत समाधि में उतरेंगे,/प्रेम पंथ के पाथेय हम।/कर स्वाहा सर्वस्व विसर्जन,द्वितीयोनास्ति, एकोअहम।//


 प्रकृति और पुरुष सृष्टि में एक दूजे के पूरक हैं -- उनके एक दूजे के अहम् का क्षय ही जीवन में चिरानुराग का  अक्षय अमिय भरता है --जहाँ   प्रेंम ,  शून्य से   समाधि तक  की यात्रा तय   करते हुए  , उत्सर्ग उत्सव  मनाता है | रचनाओं में  अनुराग के    दिव्य भाव  पाठकों को  माधुर्य के आलौकिक  संसार  में ले जाते हैं || -
डूबते यूँ जाएँ हम,//न तू-तू मै-मै और ख़ुशी गम.//दूर क्यों होना है गुम,/आ, हो समाहित हममें तुम//हो आहुति मेरे ' मैं ' की,//और तुम्हारे ' तू ' का क्षय./आत्म का उत्सर्ग उत्सव,चिर समाधि अमिय अक्षय//
इस तरह से नवरस  के विधान में रचा सबरंग क्षितिज का  सम्पूर्ण  काव्य संसार  अलग -अलग विषयों पर   गैर परम्परागत  लेखन  का सुंदर  प्रयास है |  सम्मिलित रचनाकारों मे   कई  रचनात्मकता के पथ के नव पथिक हैं | फिर भी उनका प्रयास सराहनीय है | 
  

गद्य        खंड 

साहित्य की गद्य विधा में  कहानी सबसे लोकप्रिय है |  कहानी  के उद्भव और विकास  का कोई  ठोस   आधार नहीं | संभवतः यह मानव की सहज जिज्ञासु प्रवृति से  उत्पन्न   है  | इस   स्वतंत्र विधा  का विकास लोककथा या नीतिकथा जैसे प्राचीन कथा रूपों से हुआ।  या यूँ कहें कहानी  जीवन के  किसी  एक  अथवा युगल  घटनाक्रमों को  शब्दों में जीवंत करने की कला है | जिसके स्वरूप को साहित्य के पुरोधाओं ने अपने -अपने  विचारानुसार परिभाषित किया है |  

जैसे  "मुंशी प्रेमचन्द ''जी ने  कहानी को एक ऐसी रचना माना है जिसका उद्देश्य जीवन के एक अंग   अथवा मनोभाव को  प्रभावित करना है |तो "डॉक्टर श्याम सुंदर सेन''  कहानी को निश्चित लक्ष्य  या  प्रभाव  का   नाटकीय  आख्यान मानते हैं | 

 सबरंग क्षितिज की भूमिका में विश्वमोहन जी ने  अत्यंत सरल ,  सुंदर  शब्दों में कथा को यूं परिभाषित किया है 
''  मेरा  मानना  है कि किसी क्षेत्र में  उपजने  वाली कहानी की उस माटी की कुदरती पैदाइश  है और वहां का समस्त सामाजिक परिवेश , सांस्कृतिक ताना - बाना आबोहवा , पर्यावास , हैबिटेट , सभ्यता , तीज - त्यौहार , चिरई - चिरगुन , खेती बाडी  , रहन - सहन , रीति- रिवाज , इतिहास भूगोल,  जीवन दर्शन , राजनैतिक  व्यवस्था , बोली , मुहावरे . लोकोक्ति , बाहर  की दुनिया से आकर्षण और विकर्षण , आदि  -आदि  से लेकर ' अत्यंत सूक्ष्म से  ले कर स्थूल '  तंतु  और तत्व उसकी   परवरिश  करते हैं |''
कविता जहाँ भाव रस के चिरंतन प्रभाव से     काव्य रसिकों को  अद्भुत आनन्द प्रदान  करती  है ,वहीँ  कथा स्वतंत्र  रूप से    किसी  चरित्र विशेष को पूर्णरूपेण विस्तार देती है | मानवीय संवेदनाओं को  झझकोरना इसका प्रमुख लक्ष्य है |'सबरंग क्षितिज में' कुल    मिलाकर पांच कहानियाँ शामिल की गयी हैं |   जीवन के  विभिन्न संदर्भ इन कहानियों में  जीवंत हो ,  मन में करूणा का प्रादुर्भाव करते हैं | मानवीय सरोकार   आधारभूत चिंतन को प्रेरित करते हुए कथानक से  आत्मीयता का सम्बन्ध जोड़ते हैं | बेटी और बहु में अंतर को लेकर ,दोहरी मानसिकता का  पर्दाफ़ाश करती कहानी में  ' सुधा सिंह ' व्याघ्र '' जी ने नारी जीवन की  आधारभूत  विसंगतियों को उभारा है , जहाँ     सास - ससुर का मिथ्याभिमान और दोहरा आचरण  एक सुसंस्कृत  बेटे - बहु  को घर छोड़ने पर मजबूर करता है |  'श्वेता सिन्हा'जी  की कथा  'मन्नू 'जहाँ  एक लड़की और बच्चे के  मध्य निस्वार्थ रिश्ते को इंगित  करती है,   तो   नायिका की सजगता से  बच्चाचोर  गिरोह का भंडाफोड़ कर  समाज  की स्याह हकीकत से रूबरू कराती है | इसी तरह 'अपर्णा वाजपेयी ' की कहानी  ' तीन शब्दों का कहर '  तीन बार तलाक- तलाक कहकर     शादी जैसे पवित्र बंधन की मर्यादा से खिलवाड़ करते  पात्रों की   मनमानी और भुगतभोगी के  अवसाद  से लेकर अवसान की व्यथा- कथा है | वहीँ   "कैंसर तुम मुझे हरा नहीं सकते ' कैंसर जैसी  बीमारी के साथ तन और  मन  की पीड़ा झेल रही नायिका  की कहानी  है ,जिसे  ;अनीता लांगुरी' ' जी  ने लिखा है |  बीमारी के  कारण , आजीवन साथ निभाने  का दम भरने वाले  , अवसरवादी प्रेमी के आँखें फेर लेने के  बाद  जीवन में आई रिक्तता को,  कैसे   कोई  दूसरा आकर,  अपने निर्मल प्रेम से   भरता है  यही कहानी का  मार्मिक सत्य है |
 इन सबसे इतर'' ध्रुव सिंह एकलव्य ' जी  की  कहानी  साहित्य के  पुरोधाओं  की कहानियों   से होड़  लेती नजर आती है |  'लालटेन महतो का ' आंचलिक जीवन के उस  मर्मान्तक पक्ष से अवगत कराती है,   जो  विपन्नता  में जीवनयापन कर रहे लोगों का कडवा सच है |  जहाँ आनंदी महतो अपनी  जीवन संगिनी  को  एक अदद लालटेन देने में ,  खुद को  प्रायः  असमर्थ  पाता है | आनंदी और फुलबारिया का  प्रेम  उनकी सुखी  गृहस्थी  की नींव  था | शायद फुलबरिया भी पति की  क्षमता  से वाकिफ थी ,  तभी उसकी इच्छा मात्र एक लालटेन तक सीमित थी  |  पर जब लालटेन आती है ,  तो   पत्नी को दिखाने से पहले ही अन्धेरा और कुएं का पानी .  पत्नी फुलबरिया  का  जीवन लील लेता है | जीवन के पैंतालिस साल   धधकते  पश्चाताप   में जलता  आनंदी इसी  वेदना के साथ दुनिया से विदा हो जाता है  , कि वह अपनी पत्नी   ' फुलबरिया '  को  लालटेन ना दिखा सका |   वह लालटेन फिर कभी   जलाई नहींगयी |    उसके जीवन के साथ ही लालटेन  भी बिखर जाती है |  ये एक  साधनविहीन  व्यक्ति के जीवन का  शोकगीत है , जो  अंत में  असीम करुणा और वेदना के साथ  ,  पाठक को स्तब्ध कर    कर देता है | अपनी कसी  विषय वस्तु  और  कथानक  के कारण ये कथा    समकालीन  हिंदी कहानी  की प्रतिनिधि कहानी मानी जाए ,तो कोई अतिश्योक्ति ना होगी 
  आज  हिंदी  में  सबसे  ज्यादा  जो  विधा उपेक्षित  है  , वह  निबंध  ही  है। क्योंकि    लेख  नीरस  विधा मानी  जाती  है  जिसे  गंभीर  वर्ग  के  पाठक  ही  पढ़ते  हैं।वैसे  भी निबंध  नितांत  शोध  और  चिंतन  का  विषय  होते  हैं ।दूसरे  लेखन  में  गांभीर्य  होना  नितांत  अनिवार्य  है  ।निबन्ध  लेखन  प्राय  अवरुद्ध  -सा  है। यदि  कुछेक  निबंध  लिखे भी  जा  रहे  हैं  , उनमें मौलिकता और विषयात्मक  मंथन  -चिंतन  का  अभाव  पाया  जाता  है  ।इस  विधा  के  मापदंडों  पर  खरा  उतरने वाले  नितांत  मौलिक  दो   लेख  " सबरंग  क्षितिज  का  हिस्सा  बने हैं      ,जो  'विश्वमोहन  जी'  द्वारा लिखे गये   हैं  लेखों  की  रोचक  शैली  पाठक
को   शुरू  से  अंत  तक  बांधे  रखने  में  सक्षम  है | '  ताड़ना के अधिकारी ' लेख गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखी गयी  एक चौपाई  को  नवदृष्टि से आंकने का सार्थक प्रयास है | गोस्वामी जी की,  ढ़ोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी !!!" चौपाई   प्रायः बुद्धिजीवियों और  नारी समाज के  निशाने पर रही है | यहाँ ढोल , गंवार   और शुद्र के समकक्ष नारी को प्रताड़ना के अधिकारी बताये जाने पर यदा - कदा   विद्वानों की टेढ़ी नजर  इस चौपाई पर  तनी रहती है | आखिर  इतने सुसंस्कारी  गोस्वामी जी ने कुछ  कथित असहाय वर्गों के प्रति ये संकीर्णता  की भावना क्यों रखी ?  ना जाने कब  से  इस यक्ष प्रश्न का उत्तर  नदारद है , पर  विश्वमोहन जी ने  अपने चिंतन  - मंथन और बौद्धिक चातुर्य से इस प्रसंग को  आंकने का प्रयास कर एक मौलिक चिंतन से साहित्य प्रेमियों को रूबरू कराया है | ' ताड़ना  'शब्द  की व्यापकता को उन्होंने एक नए अर्थ में प्रस्तुत कर  ताड़ना और प्रताड़ना  के अंतर को समझाकर गोस्वामी जी को  सदियों के  कोप   से मुक्त करवाया है |  सुधि पाठकों के   लिए ऐसे ललित निबन्ध पढ़ना   सौभाग्य है  और ताड़ना शब्द की  नितांत मौलिक व्याख्या जानना अत्यंत रोचक भी | |एक  दूसरे  लेख''चेतना , पदार्थ और ऊर्जा ' के जरिये , उन्होंने  ये बताने का प्रयास किया है कि चेतना आत्मा का विषय है , तो पदार्थ और ऊर्जा भौतिकता का | इस निबन्ध में भी उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस विषय पर  बहुत रोचक चिंतन किया है जिसे जानना पाठकों के लिए बहुत दिलचस्प रहेगा |  उनकी  विद्वतापूर्ण शैली पाठकों   के ज्ञानवर्धन में पूर्णतः सक्षम है | 


माननीय जनों के पुस्तक पर   कुछ   अनमोल  उदगार --

पुस्तक के विषय में कुछ अनुभवी और  वरिष्ठ  साहित्यकारों ने अपने अनमोल  उद्गार शुभकामना स्वरूप दिए हैं  , जिन्हें सगर्व  पुस्तक के  कवर पृष्ठ पर दिया गया है | इनमें सबसे पहला नाम  साहित्य और ब्लॉग जगत के अत्यंत अनुभवी और   सुदक्ष  रचनाकार  'श्री गोपेश मोहन जैसवाल जी 'का है ,  जिन्होंने पुस्तक के विषय में लिखा है , ''सबरंग क्षितिज - विधा संगम '' की सभी रचनाएँ स्तरीय हैं  | उनमें विविधता है , रोचकता है , मौलिकता है और पाठकों के साथ तादात्मय स्थापित करने की  विशिष्ठता   है | मुझे आशा है और पूर्ण  विश्वास भी कि   साहित्य जगत में ' सबरंग क्षितिज 'सांझा पुस्तक , स्वयं को स्तरीय तथा मौलिक साहित्य के एक प्रतिष्ठित मंच  के रूप में स्थापित करेगी | ''
आदरणीया डॉक्टर  कल्याणी  कुसुम सिंह जी ने पुस्तक को सराहते हुए लिखा है , ''  कि   सबरंग विधा संगम की रचनाएँ विविधता से  परिपूर्ण हैं | रचनाओं की विविधता , पुस्तक की  खूबसूरती है |कुछ रचनाएँ वैयक्तिक सामाजिक अनुभवों की कवितामय अभिव्यक्ति   है |  सभी रचनाओं में कल्पना की उड़ान , सामाजिक विसंगतियों  पर प्रहार के साथ परिवर्तित युग की  आहट  है |प्रत्येक  कवि - कवियित्री की अपनी अपनी   शैली होती है , जो सबरंग क्षितिज पर बिखरने में कामयाब हुई है | '' 
 अंत में    प्रसिद्ध   उपन्यासकार डॉक्टर  फख़रे  आलम खान जी ने लिखा है , कि पुस्तक  में लेखकों के समूह को एकत्र करके , साहित्य के लिए नया मार्ग खोला है  , जिससे   नए व पुराने साहित्यकार , एक   दूसरे    के निकट आकर , एक दूसरे का साहित्य पढने के बाद , साहित्य संसार में नयी गति आएगी | '' 
   

  अंत में -----

 यही कहना चाहूंगी | गद्य और पद्य से सजा  नवरचनाकारों  का  संस्कार  विधा का ये सामूहिक संगम  , ब्लॉग जगत में  अपनी तरह का नितांत सार्थक प्रयोग है , जिसके पीछे   रवीन्द्र सिंह यादव' जी की  अनथक मेहनत और साधना है , जो इस सुंदर पुस्तक के रूप में फलीभूत हुई है | उन्होंने निस्वार्थ भाव से नए  रचनाकारों केलिए जो श्रम किया ,वह मुक्त कंठ से  सराहने योग्य है |उनके कुशल संपादन में पुस्तक  त्रुटिहीन रूप  में  नज़र  आती है |जिस में  सभी सहभागी रचनाकारों  ने अलग -अलग दायित्व  निभाते हुए अपना सम्पूर्ण  सहयोग दिया है   |   
 प्रतिष्ठित  अयन प्रकाशन से प्रकाशित  इस  पुस्तक  का कवर पेज बहुत आकर्षक और मजबूत है  ,जिसकी     साज - सज्जा  अत्यंत मनमोहक  है । इस पुस्तक के सभी  सहभागी रचनाकारों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं और रवीन्द्र जी को उनके भागीरथ प्रयास के लिए साधुवाद | आशा है सामूहिक  रचना यात्रा का ये क्रम भविष्य में भी जारी रहेगा |   

पुस्तक समीक्षा -- कासे कहूँ

  सुरेन्द्रनगर गुजरात से प्रकाशित होने वाली प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका   'विश्वगाथा' मेँ,'कासे कहुँ 'पर लिखी मेरी समीक्षा को स्...